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जनता की आवाज की रक्षा ऐसे तो नहीं होती

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहुत बड़ी बात कही है कि वे जनता की आवाज की रक्षा कर्नाटक की तरह ही करते रहेंगे। जनता तो बोलती नहीं। जनता बोलती होती तो नेता नहीं बोल पाते। जनता बोलने में नहीं, सुनने में विश्वास करती है। आजादी के बाद से आज तक वह नेताओं की हो सुन रही है। पांच साल वह नेताओं और उनके समर्थकों की ही सुनती है और जब उसे नेता चुनने का मौका मिलता है तो अपनी पसंद का नेता चुनती है, अपनी उम्मीदों का नेता चुनती है। वोट ही उसकी अभिव्यक्ति है और उस अभिव्यक्ति का गला घोंटकर भी राहुल अगर जनता की आवाज की रक्षा के दावे कर रहे हैं तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है? कर्नाटक की जनता ने भी अपनी पसंद के नेता चुने हैं। उसने किसी भी दल को सरकार बनाने लायक नहीं समझा। कांग्रेस को तो बिल्कुल भी नहीं समझा। उसके तो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सिद्धारमैया ही दो में से एक सीट पर हार गए। 16 मंत्रियों को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। ऐसे में राहुल गांधी किस तरह कह सकते हैं कि जनादेश कांग्रेस के पक्ष में है? यही बात जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी पर भी लागू होती है। उनकी पार्टी के 38 प्रत्याशी जीते हैं। उसमें भी एक बसपा का है। 37 सीट जीतकर कुमार स्वामी मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं? दो सीटों से चुनाव लड़ना क्या जनादेश की भावना का सम्मान है? एक सीट कुमारस्वामी छोड़ेंगे, यह जनता की भावना का निरादर तो होगा ही, सीट छोड़ने के बाद वहां राज्य पर उपचुनाव का खर्च भी बढ़ेगा। सिद्धारमैया चुनाव जीतते तो वह भी यही करते। कांग्रेस क्या यह बताएगी कि यह भ्रष्टाचार नहीं है, जनादेश के साथ खिलवाड़ नहीं है?
कांग्रेस को कर्नाटक मामले में बीजेपी की नैतिकता पर सवाल उठाने और वहां के राज्यपाल वजु भाई वाला का इस्तीफा मांगने का निःसंदेह अधिकार है क्योंकि बोलने पर इस देश में कोई टैक्स नहीं है। लेकिन उसे अपने पूर्व आचरण पर भी गौर कर लेना चाहिए। उसे 2009 में कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज, 2005 में बिहार विधानसभा को अकारण भंग करने वाले बूटा सिंह, बिना किसी बहुमत के 2005 में झामुमो नेता सिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनवा देने वाले सैयद सिब्ते रजी, 1998 में जगदंबिका पाल को दो दिन का मुख्यमंत्री बनाने वाले रोमेश भंडारी के आचरण पर भी गौर करना चाहिए और कहना चाहिए कि कांग्रेस के दौर में उसके द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने विविध राज्यों में लोकतंत्र और जनादेश का गला घोंटा था। हरियाणा के राज्यपाल जीडी तापसे ने तो पक्षपातपूर्वक देवीलाल की सरकार की जगह भजनलाल की सरकार बनवा दी थी। 1988 में मुंबई के राज्यपाल वेंकट सुबैया ने बोम्बई की सरकार को बहुमत खो चुकी बताकर बर्खास्त कर दिया था। कोर्ट के हस्तक्षेप और राज्यपाल के निर्णय को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद फिर बोम्बई की सरकार बनी।
1996 में गुजरात के राज्यपाल कृष्णपाल सिंह ने बीजेपी की सुरेश मेहता सरकार द्वारा सदन में विश्वास मत हासिल कर लेने के बाद भी विधानसभा भंग कर दी ग्रेस राज में हुए इन कारनामों को क्या जनादेश के सम्मान और लोकतंत्र की रक्षा के आलोक में देखा जाना चाहिए। वैसे इतना तो सच है कि कर्नाटक के चुनाव नतीजे ने यह साबित कर दिया है कि जनता का झुकाव आज भी बीजेपी की ओर है। वह कांग्रेस और अन्य दलों की निरंतर नकार रही है। बीजेपी सबसे बड़ा दल होने के बाद भी अगर सत्ता से दूर है तो उसे इस पर मंथन करना चाहिए। यह बात तय है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को इस बात का विश्वास हो गया है कि अकेले दम पर बीजेपी के विजयरथ को रोक पाना अब उनके बूते का नहीं है। इसीलिए वे गठजोड़ कर रहे हैं। गठजोड़ हमेशा कमजोर व्यक्ति करता है। बीजेपी का दक्षिण में कदाचित अपना मजबूत संगठन नहीं है। उसे वहां अपना संगठन भी मजबूत करना चाहिए और उनके जरिए राजनीतिक गतिविधियों को भी तेज करना चाहिए। कर्नाटक में बीजेपी ने सदन में शक्ति परीक्षण न कराने का निर्णय लेकर अच्छा ही किया है।
अगर बीजेपी बहुमत हासिल कर लेती तो विपक्ष इसके विरोध में इतना ढोल पीटता कि बीजेपी के लिए अपना सिर बचाना मुश्किल होता। वैसे भी स्वार्थों का यह बेमेल गठबंधन लंबा चलने वाला नहीं है। बीजेपी को सही वक्त पर सही प्रहार करना होगा। इंतजार का फल मीठा होता है। कांग्रेस खुश है क्योंकि चोर दरवाजे से ही सही, उसके पास कर्नाटक की सत्ता एक बार फिर आ गई है। कर्नाटक में जनादेश का अपमान हुआ या नहीं, किया तो किसने किया, यह सवाल तेजी से उछल रहा है। इस मुद्दे पर जनता को भी गुमराह करने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर भारतीय जनता पार्टी पर जनादेश के अपमान का आरोप लगा रही है जबकि उन दोनों दलों के गठबंधन को बीजेपी अवसरवादिता मान रही है। कर्नाटक की जंग में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल एक तरफ हैं और बीजेपी बिल्कुल अकेली। उसकी नैतिकता पर सवाल उठाने वाले अपने अतीत में झांकना नहीं चाहते। उन्हें पता है कि जनता वर्तमान को देखती है। अतीत भूल जाती है। कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी बीजेपी सत्ता हासिल करने में विफल रही। इस चुनाव के बाद बीजेपी ने तेलंगाना, आंधप्रदेश, बंगाल और उड़ीसा पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। उसका ध्यान 2019 लोकसभा के चुनाव के पहले इन राज्यों में अपना प्रदर्शन सुधारने पर है। तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा में 2019 में विधानसभा चुनाव होने हैं। बीजेपी की एक कोशिश लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की भी हो सकती है। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार नहीं है, लोकसभा चुनाव में उन राज्यों पर बीजेपी का विशेष जोर रहेगा और जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है, वहां विकास का दायरा बढ़ाकर बीजेपी जनता-जनार्दन के दिल पर राज करना चाहेगी। कर्नाटक चुनाव ने लोकसभा चुनाव को लेकर चिंतित बीजेपी की पेशानियों पर बल ला दिया है। बीजेपी को शिकस्त देने के लिए विपक्ष कई राज्यों में गोलबंद हो सकती है। अगर वे पहले गोलबंद हो जाएं तो जनता को भी उन्हें नकारने में सहूलियत होगी लेकिन मोदी विरोधी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पैंतरा आजमा सकते हैं। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। इस बार यहां सपा-बसपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ सकती हैं। कैराना संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में सपा और लोकदल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। बसपा भी यहां उनका साथ दे रही है। महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाने के लिए कांग्रेस-एनसीपी ने पहले ही बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ने का संकेत दे रखा है। बीजेपी का निरंतर विरोध कर रही शिवसेना भी अगर इस भीड़ में शामिल हो जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। कयास हैं कि शिवसेना भी साथ आ सकती है। बीजेपी-शिवसेना के रिश्ते ठीक नहीं चल रहे। पश्चिम बंगाल में सोनिया-ममता की डिनर डिप्लोमेसी भी सहयोग का नया रंग सामने ला सकती है। बिहार में कांग्रेस-राजद के बीच गठजोड़ तो पहले ही से है लेकिन इस बार दोनों मिलकर लोकसभा चुनाव में उतर सकते हैं।
तमिलनाडु में पिछले विधानसभा चुनाव की तरह ही कांग्रेस-डीएमके 2019 का लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ सकती है। कर्नाटक में कांग्रेस जेडीएस, आंध्रप्रदेश में कांग्रेस और तेलुगुदेशम पार्टी का गठबंधन हो सकता है। तेलंगाना में बीजेपी के खिलाफ तीसरे मोर्चे की वकालत भी कम चिंताजनक नहीं है। झारखंड में कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा , हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल और कांग्रेस और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस, बीजेपी-पीडीपी गठबंधन को टक्कर दे सकते हैं। विपक्ष अगर बीजेपी के खिलाफ पहले ही एकजुट हो जाएं तो जनता को बीजेपी और गठबंधन के बीच ही चुनाव करना होगा लेकिन अलग-अलग चुनाव लड़कर भी वे जनता के फैसले को चकमा दे सकते हैं। देश के लिए भी जरूरी है कि वह किसी भी दल को आधा-अधूरा जनादेश न दे क्योंकि ऐसी स्थिति में लोकतंत्र भी कमजोर होता है और राज्य का विकास भी प्रभावित होता है। इस देश की जनता को यह भी देखना होगा कि देश का व्यापक हित कौन कर सकता है। उसे जाति-धर्म के आधार पर नहीं, लोकहित में वोट करना होगा तभी यह देश अपनी पुरानी गौरव-गरिमा को प्राप्त कर सकेगा। तरक्की के शीर्ष तक पहुंच सकेगा।
हिन्दुस्थान समाचार/सियाराम पांडेय ”शांत”
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