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सुप्रीम कोर्ट का एससी-एसटी एक्ट पर दिए गए दिशा-निर्देशों पर रोक लगाने से इनकार

 दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट पर दिए गए दिशा-निर्देशों पर कोई रोक लगाने से इनकार किया है। केंद्र सरकार के रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई करते हुए जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की बेंच ने कहा कि हम एससी, एसटी एक्ट के खिलाफ नहीं हैं लेकिन इस एक्ट के जरिए बेगुनाहों को सजा नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ कार्रवाई से पहले शिकायत की पड़ताल कर ली जाए तो इसमें क्या दिक्कत है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को दो दिनों में अपना पक्ष लिखित रुप में दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट इस मामले पर दस दिनों के बाद सुनवाई करेगी।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करनेवालों ने फैसला पढ़ा भी नहीं होगा। इन प्रदर्शनों के पीछे स्वार्थी तत्व हैं| हमारी चिंता उन बेकसूर लोगों को लेकर है जो बिना किसी गलती के जेल में हैं। हमारी चिंता एक्ट के दुरुपयोग को लेकर है। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि बिना वेरिफिकेशन के गिरफ्तारी का सरकार समर्थन क्यों कर रही है।

सुनवाई के दौरान जब अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अगर सार्वजनिक तौर पर किसी के खिलाफ जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया जाए तब क्या होगा| तब कोर्ट ने कहा कि एक सप्ताह में उसकी जांच हो। निर्दोषों के लिए भी फोरम होना चाहिए। अटार्नी जनरल ने कहा कि काफी लोग इसके शिकार हैं। उनके अधिकारों में हम बाधक नहीं बन सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि हमने एससी, एसटी एक्ट को कमजोर नहीं किया है| हमने अपराध प्रक्रिया संहिता की व्याख्या की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पीड़ितों को मुआवजे के लिए एफआईआर के दर्ज होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने कहा कि इस एक्ट में आरोपों को वेरिफाई करना मुश्किल है| इसलिए इस तरह की गाइडलाइन जारी की गई। उन्होंने कहा कि दूसरे अपराधों में आरोपों को वेरिफाई किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये जरुरी नहीं कि एससी , एसटी समुदाय के लोग ही इसका दुरुपयोग करें| पुलिस भी दुरुपयोग कर सकती है।

सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि जस्टिस कर्णन के मामले में चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर दलित होने की वजह से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया गया था लेकिन वे आरोप सही नहीं थे| इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की गई।

आज सुबह केंद्र सरकार की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग रोकने के लिए दायर केंद्र सरकार की याचिका को खुली अदालत में सुनवाई को तैयार हो गया। आज केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इसे मेंशन किया और आज ही दो बजे सुनवाई की मांग की। बाद में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने संबंधित जजों यानि जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित की बेंच का गठन कर दिया।

कल यानि 2 अप्रैल को केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल किया था। केंद्र सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद इस कानून का उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा। केंद्र सरकार ने कहा है कि अग्रिम जमानत के रास्ते खोलने से इसका अभियुक्त दुरुपयोग करेगा और पीड़ित को धमका सकता है| वो जांच को प्रभावित कर सकता है। केंद्र सरकार ने इस मामले पर खुली अदालत में बहस और सुनवाई की मांग की।

रिव्यू पिटीशन में केंद्र सरकार ने कहा है कि इस कानून में अभियुक्त को अग्रिम जमानत का हक न देने से धारा 21 में उसे मिले जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन नहीं होता है। एससी, एसटी कानून में ये 1973 में नये अधिकार के तौर पर जोड़ा गया था। सरकार ने कहा है कि अभियुक्त के अधिकारों के संरक्षण के साथ ही एससी, एसटी समुदाय को संविधान में मिले अधिकारों को संरक्षित करना भी महत्वपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि कानून का दुरुपयोग उसके प्रावधानों की दोबारा व्याख्या का न्यायोचित आधार नहीं हो सकता है।

इससे पहले केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोजपा ने भी रिव्यू पिटीशन दाखिल की थी। लोजपा के रिव्यू पिटीशन में इस मामले को संविधान बेंच भेजने की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 20 मार्च को लोकसेवकों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि लोकसेवक को गिरफ्तार करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत देने पर कोई रोक नहीं है। निचली कोर्ट इस मामले में अग्रिम जमानत भी दे सकती है।

कल यानि 2 अप्रैल को ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ एससी, एसटी आर्गेनाईजेशन ने भी दायर किया था। याचिकाकर्ता ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष मेंशन करते हुए इस पर जल्द सुनवाई की मांग की। लेकिन कोर्ट ने इस पर जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया था।

हिन्दुस्थान समाचार

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