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बॉलीवुड में आत्महत्या, कला और कलाकार की चरम अवनति

बॉलीवुड के सुशांत सिंह राजपूत की अजीब मृत्यु के बाद किंवदंतियाँ, आरोप, प्रत्यारोप, दोषारोपण और षडयंत्र के किस्से और ख़बरों का बाज़ार गर्म है

जब कला ही जीवन की साधना और साध्य हों तो आत्महत्या का क्या स्थान है एक सच्चे कलाकार के जीवन में? कौन कर रहा है ये आत्महत्यायें और क्यों? कोई बूढ़ा और बीमार, अति विपन्न और असफल कलाकार नहीं बल्कि ये पाप वो कर रहे हैं जो कम वय में ही सफल, अति-संपन्न और लोकप्रिय हैं। उनको सुनें तो यही लगता है कि वो अपनी कला के बौद्धिक और आध्यात्मिक पक्ष से भी चिर-परिचित हैं, और समझदार लोग हैं, फिर भी वो आत्मघाती निर्णय ले लेते हैं। बॉलीवुड के सफल कलाकार सुशांत सिंह राजपूत ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली

भाँति-भाँति की किंवदंतियाँ, आरोप, प्रत्यारोप, दोषारोपण और षडयंत्र के किस्से कहानियों और खबरों का बाज़ार गर्म है। फिल्म उद्योग स्वयंमेव अपनी परते उघाड़ता हुआ नग्नावस्था में आ खड़ा हुआ है। हम जो उसका स्वरुप देख रहें है वो बहुत सुंदर, सुघढ़ और स्वस्थ नहीं है। लगता है जैसे ये एक विभत्स, कुरूप, सड़ांध मारता, डरावना, महास्वार्थी, कुटिल और संवेदनहीन संसार है जो रचनात्मक कम विध्वंसकारी अधिक है, एक दु:स्वप्न की तरह।

ऐसा होना तो नहीं चाहिये था। फिल्म कला तो अभूतपूर्व संगम है सारी कलाओ और उनकी साधना में रत कलाकारों और रचनाकारों का, चाहे वो संगीत, नृत्य, गायन और अभिनय हों या दृश्य कलायें या लेखन और निर्देशन। अपनी कला को अभिव्यक्त करने का इस से बड़ा, सर्वग्राही, लोकप्रिय और सर्वव्यापी मंच और कहाँ मिल सकता है? जो इस क्षेत्र में संघर्ष के दौर से गुज़र कर अपना एक स्थान बना चुके हैं, उनके विषादग्रस्त हो कर आत्महत्या करने का कोई प्रथम द्रष्ट्या कारण नहीं होना चाहिये। लेकिन ऐसा हुआ है और होता रहा है। कहीं तो कुछ है जो ठीक नहीं है और इसका समुचित विश्लेषण आवश्यक है।

तो पहले हमें समझना होगा बॉलीवुड के सामाजिक परिवेश को। ये बहुत बड़ा समाज नहीं है, एक छोटे कस्बे जितनी आबादी है इसकी भले ही इसका प्रभाव क्षेत्र बहुत बड़ा हो। यहां सब एक दूसरे को जानते हैं, कौन क्या कर या नहीं कर रहा है इसकी खोज खबर रखते हैं। यहाँ पीठ पीछे की गपबाज़ी और चुग़लखोरी भी बहुत होती है और जो इस समाज का अंग बन चुके हैं वो इसे बहुत गंभीरता से लेते हैं। किस के बारे में क्या कहा या नहीं कहा जा रहा है ये बहुत महत्वपूर्ण है। इस समाज का काम धाम आपसी आचार-व्यवहार, और व्यापार पर आधारित है और यहां सब पैसा, सफलता, प्रसिद्धि और अमरत्व के पीछे दौड़ रहे होते हैं। लेकिन एक काम यहाँ सब बड़े मनोयोग से करते हैं, दूसरों की असफल होने और गड्ढे में गिरने की प्रतीक्षा, वही कस्बाई प्रवृत्ति।

एकाग्र कला साधना गौण हो जाती है ऐसी आपा-धापी में। इस समाज की रचना और अवधारणा में कुछ भी भारतीय नहीं रहा अब, पहले था कुछ सीमा तक। अब तो यह पाश्चात्य परंपराओ की ही नकल करता समाज है और इस तरह ये उसके सारे गुण दोषों को भी अपना लेता है। जाहे वो व्यापार हो या व्यवहार, या फिल्म की पटकथा या उसकी फिल्मांकन विधा, सब आयातित है। आज बॉलीवुड फिल्म उद्योग लगभग पूरा का पूरा विदेशी कंपनियों की कृपा पर निर्भर है। जो कहने के लिये स्वतंत्र हैं वो भी इनके पास ही घूम फिर के पहुंचते हैं। ये कंपनियां और इनके अधिकारी शुद्ध व्यावसायिक मानसिकता से संचालित होते हैं।

तो यहाँ कलाकार ‘गुरु’ नहीं ‘गॉडफ़ादर’ को खोजता है। ये शब्द ‘माफिया’ (एक अपराधी वंश परंपरा) की अवधारणा के मूल में है, वैसे इसकी व्युत्पत्ति ईसाई पंथ के कर्मकाँड से हुई है।तो जो आप बालीवुड में देखते हैं, वो हॉलिवुड का ही प्रतिबिंब है। नाम तो था ही, चाल और चरित्र भी वही हो गया है पिछले १५ सालों में।

इस समाज के आपसी संबधों के आधार और सामाजिक मूल्य और आपसी लेन-देन भी बाकी के समाज से इतर हैं। जिसे आप नैतिक मूल्य कहते या समझते हैं, उनके कोई माने नहीं यहाँ। झूठ बोलना पाप नहीं, सामान्य शिष्टाचार है इस समाज में। सब खुल के झूठ बोलते हैं। अब यहीं आ के समस्या खड़ी हो जाती है। जब सब झूठ बोल रहे हैं तो किस का विश्वास करें? कोई किसी का मित्र नहीं। अपना स्वार्थ सर्वोपरि है।तो यहां कोई किसी का विश्वास नहीं करता और प्राय: सभी एक असुरक्षा की भावना के साथ जीने की या तो आदत डाल लेते हैं या फिर उससे बचने के लिये अपने अपने उपाय करते हैं, जो मूलत: तीन हैं।

पहला तो पैसा है। पैसा दो और काम लो। बिना पैसे के एक अंगुली भी न उठेगी। जो मेरी कीमत है वो दो, ‘साईनिंग’ का पैसा सामने रखो फिर बात करेगें। लोग पैसा ले कर आप के व्यापार प्रबंधक के आगे-पीछे घूमते हैं। आप को भी पता चल जाता है कि बाज़ार में आप का क्या मोल है, और आप भी उस के अनुसार भाव-ताव करते हैं। जब आप सफल हैं तो ये कारगर सिद्ध होता है।

लेकिन सफल बनने के लिये क्या करें? तो दूसरा उपाय है। उसके लिये ‘कैंप’ और गॉडफ़ादर चाहिये जो आप की योग्यता को पहचाने और आप पर दाँव लगाये, शर्त ये कि ‘गाडफादर’ का स्वयं का पुत्र या पुत्री न हो या हो भी तो नितांत अयोग्य हो और उस को ले कर फिल्म बनाना ऐसे ही हो जैसे पैसा नाली में बहाना। यहीं माफिया का खेल का प्रारंभ होता है। अब चूँकि ये समाज बहुत छोटा है आप इन ‘गाडफादरों’ को अंगुली पर गिन सकते है। कुछ फिल्म निर्माण के क्षेत्र में है तो, कुछ वितरण में। ये सब एक ‘तंत्र’ का हिस्सा हैं, एक दूसरे को जानते हैं, और आपस में मिलजुल के पूरे फिल्म उद्योग पर नियंत्रण रखते हैं।

यदि फिल्म उद्योग के अंदर भी कहीं कोई ऐसा उभरता है जो इनके वर्चस्व को चुनौती देता दीख पड़ता है, उसे बड़ी ही सफाई से दबा दिया जाता है या इनके रास्ते पर आने के लिये विवश कर दिया जाता है। व्यक्तिगत संबधों का बहुत मोल है इस संसार में लेकिन उनका आधार भावनात्मक न हो कर ‘उपयोगितात्मक’ होता है। सब ये जानते और स्वीकार करते हैं और इस बात का बहुत रोना नहीं रोते कि देखो फलाँ सफल हो गया तो मुझे भूल गया।

तीसरा उपाय यह है कि आप अपने दम खम पर कुछ अनूठा कर गुज़रें और अपना एक विशेष स्थान बना लें। जमे जमाये माफ़िया और दबंगों को सफलता बहुत अच्छी लगती है। आप भी उनके वर्चस्व को चुनौती नहीं देना चाहते और उनके समाज का हिस्सा बनने के लिये तैय्यार हैं। उनकी भ्रष्ट और लंपट जीवन शैली और अनैतिक जीवन मूल्यों से आप को वैसे भी बहुत लगाव था। आप उनकी पार्टियों में जाने के सपने देखते थे। आप उनकी हाँ में हाँ मिला कर उनका विश्वास जीतते हैं। इसमें खूब दिखावा और छलावा होता है। आप के मुंह पर कुछ और पीठ पीछे कुछ और कहा जाता है। सब जानते हैं कि क्या हो रहा है फिर भी इसे स्वीकार कर लेते हैं। जो पुराने खिलाड़ी हैं वो घुटे हुये हैं इस खेल में, नये नहीं समझ पाते। जो खानदानी हैं वो तो बचपन से देखते आये हैं तो सब समझते हैं। इस जीवन शैली में मंहगें शौक भी पालने पड़ते हैं, पार्टियों में जाना पड़ता है, महिला मित्रों को पालना पोसना पड़ता है, ऐसे पड़ोस में रहना पड़ता है जो आप को एक नई पहचान देता है। खर्चे बढ़ते हैं। दिखावा चरम पर पहुंचता है।

इस पूरी व्यवस्था में कला या उसकी साधना का लेश मात्र भी स्थान नहीं। यहाँ जीवन के भावनात्मक और आध्यात्मिक पहलू भी शून्य हैं, और आप एक पल भी सुरक्षित नहीं। आप के सारे संबंध पैसे, सफलता, और प्रसिद्धि पर आधारित होते हैं। बिना उसके काम चलने वाला नहीं। जिस दिन ये दोनों हाथ से निकलने लगे घोर नैराश्य के भाव आप को घेर लेते हैं। मैंने देखा है ऐसे कलाकारों को जो सफलता के दौर में भीड़ से भागते थे, और असफलता के दौर में जब भीड़ गायब हुई तो घोर निराशा में नशे की लत अपना बैठे और एक दिन अपने घर में मृत पाये गये।

लेकिन किस सफलता की बात हो रही है यहाँ? आप की फिल्म की व्यावसायिक सफलता ही एकलौता मानदंड है जिस पर आप खरे उतरे तो ‘नायक’ और ‘महानायक’ कहलायेगें और पैसे की झोली लिये निर्माता आप के आगे पीछे घूमेंगें। यहाँ आप अपनी कला और हुनर में सफलता के नये शिखर छू लें ये पर्याप्त नहीं है क्यों कि फिल्म की व्यावसायिक सफलता आप की फिल्म का प्रचार और वितरण कैसे होता है उस पर निर्भर करती है। ये तभी संभव है जब आप किसी प्रतिष्ठित और जमे जमाये बैनर या फिल्मी माफ़िया से जुड़े हों। इसलिये कलाकार प्राण प्रण से प्रयास करते हैं कि वो माफ़िया द्वारा स्वीकार कर लिये जायें।

अब सुशांत सिंह राजपूत के साथ क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ ये सब जांच-पड़ताल में निकल कर आयेगा। जिन परिस्थितियों और जिस समाज में वो रह रहे थे, उसमें ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं है। यदि वो किसी फिल्मी परिवार में जन्में और पले बढ़े होते तो इस समाज की रीतियों और नितियों को आसानी से आत्मसात कर अपने आप को ढ़ाल लेते। बाहर से आये थे इसलिये दबाव नहीं सह सके। कम से कम प्रथम दृष्टि में तो ऐसा ही लगता है।

लेकिन हमें ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहाँ कलाकारों ने अपनी कला के दम पर बालिवुड में अपना एक स्थान बनाया और सफल हुये। उन्हें भले ही अपार सफलता और प्रसिद्धि न मिली हो फिर भी वो अपनी कला की साधना करते रहे, पैसा भी अर्जित किया थोड़ी बहुत प्रसिद्धि भी बटोरी, करोड़ों नहीं मिले मेहनताने में उन्हें, लेकिन लाखों तो मिले और अच्छा काम करने को मिला।

लेकिन फिर उनका क्या हो जो मन बनाये बैठे हैं कि उन्हें शीर्ष पर पहुँचना हैं, अपार सफलता पानी है, घुड़दौड़ में जीतना है,सब को पीछे छोड़ देना है? यदि विधि के विधान से उन्हें कुछ सफलता मिल गई तो ये महत्चाकाँक्षा और बलवती होती है, आचार व्यवहार बदलता है, जीवन शैली बदलती है, और जमे जमाये लोगों को लगता है कि ये कहाँ से आ गया। ये तो हमारे जैसा/जैसी नहीं है। कस्बाई माहौल में चुग़लखोरी में कही गई बात बहुत जल्दी फैलती है। फिर आप के पैरों तले जमीन खिसकती है और नीचे भयावह अंधेरी खाई दिखाई देती है जो आप को निगल लेने के लिये तैय्यार है। आप को जीवन और जीवन शैली के क्षणभंगुर होने के भयावह सत्य की आध्यात्मिक समझ हो तो ये झटका सहना कठिन न होता, लेकिन अंधाधुंध दौड़ में ऐसी समझ नहीं उपजती।

इस उहापोह से निकलना हो तो कला के मूल उद्देश्य और हिंदु शास्त्रों में प्रतिपादित चार पुरुषार्थों की अवधारणा पर ध्यान देना होगा। लेकिन चकाचौंध भरे नवयुग में इन चिर-पुरातन विचारों की बात करे तो कौन करे?

Rajesh Kumar Singh

By Rajesh Kumar Singh

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