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मिसाइल क्षेत्र में सफलता की महागाथा

सफलता की एक नई महागाथा लिखते हुए भारत ने परमाणु क्षमता से युक्त अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया है। 5000 से 8000 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर स्थित लक्ष्य को भेदने में सक्षम इस प्रक्षेपास्त्र को ओड़ीसा के बालासोर जिले के अब्दुल कलाम समुद्री द्वीप से आकाश में छोड़ा गया। यह प्रक्षेपण, मोबाइल प्रक्षेपण यान के जरिए किया गया। भारत इस परीक्षण के पहले से ही 5 हजार से 55 हजार किलोमीटर की दूरी तक मार करने की मिसाइल क्षमता वाले वैष्विक समूह में शामिल हैं। इसके पहले यह ताकत अमेरिका, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन के पास थी। हालांकि लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइल अग्नि-5 का यह छठा प्रायोगिक परीक्षण है। पहला परीक्षण 19 अप्रैल 2012, दूसरा 15 सितंबर 2013, तीसरा 10 सितंबर 2016, चौथा 26 दिसंबर 2016 और पांचवां परीक्षण 18 जनवरी 2018 को किया गया था। अब यह छठा परीक्षण 3 जून 2018 को किया गया है। 50 टन वजनी यह मिसाइल 17.5 मीटर लंबी है। यह अपने साथ एक टन भार का विस्फोटक ले जाने में समर्थ है। इसके साथ ही भारत अमेरिका, रूस, चीन और फ्रांस के साथ इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल के क्लब में शामिल हो गया है। इन मिसाइलों की खास बात ये है कि ये सभी स्वदेश में ही विकसित की गई तकनीकों से आविष्कृत की गई हैं। इससे जाहिर होता है कि हमारे वैज्ञानिकों को प्रयोग के उचित अवसर और वातावरण दे दिए जाएं तो वे अपनी मेधा का उपयोग करके क्रांति ला सकते है। 20 मिनट में 5 हजार किलोमीटर की दूरी तक का अचूक निशाना साधने वाली बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण देश के लिए सामरिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, सेना एवं जनता का मनोबल मजबूत करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि हमें यह कामयाबी आशंकाओ के उस संक्रमण काल में मिली है, जब भारत चीन से पिछड़ रहा है और देश की सुरक्षा संबंधी नीतियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने के उद्देश्य से बनाई जा रही हैं।

इन प्रयोगों से साबित हुआ है कि वैज्ञानिक अनुसंधानों में नवोन्मेश के लिए पूंजीपतियों की शरण में जाने की जरूरत नहीं है ? मसलन शोध केंद्रों में निजी पूंजी निवेश जरूरी है, ऐसी विरोधाभासी अटकलों में 85 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक से निर्मित अग्नि 5 का छठा परीक्षण यह उम्मीद जगाता है कि हम देशज ज्ञान, स्थानीय संसाधन और बिना किसी बाहरी पूंजी के वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल करने में सक्षम हैं। वैसे भी पश्चिमी देशों ने भारत को मिसाइल तकनीक देने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। इस लिहाज से यह उपलब्धि पश्चिमी देशों को भी आईना दिखाना है। सामरिक महत्व के हथियार यदि हम अपने ही बूते बनाएंगे तो हमारी गोपनीयता भंग होने का खतरा भी नहीं रहेगा ? भारत में रक्षा उपकरणों की उपलब्धता की दृष्टि से प्रक्षेपास्त्र श्रृंखला प्रणाली की अहम भूमिका है। अब तक इस कड़ी में देश के पास पृथ्वी से वायु में और समुद्री सतह से दागी जा सकने वाली मिसाइलें ही उपलब्ध थीं, लेकिन अग्नि 5 ऐसी अद्भुत मिसाइल है, जो सड़क और रेलमार्ग पर चलते हुए भी दुश्मन पर हमला बोल सकती है। इस श्रृंखला में अग्नि-1 की मारक क्षमता 700 किलोमीटर, अग्नि-2 की 2000 किलोमीटर, अग्नि-3 की 3000 किलोमीटर, अग्नि-4 की 3500 किलोमीटर और अग्नि – 5 की 5000 किलोमीटर है और इस छठी मिसाइल की मारक क्षमता आठ हजार किलोमीटर तक है। यह जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल है। भारत से चीन की 3488 किलोमीटर लंबी सीमा जुड़ी है, जो अधिकांश जगह विवादित है। अब इस मिसाइल की जद में संपूर्ण एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के साथ यूरोप का भी बड़ा हिस्सा आ गया है। यह मिसाइल एक बार छोड़ने के बाद रोकी नहीं जा सकती है। इसे सड़क के रास्ते कहीं भी पहुंचाया जा सकता है। इस खूबी के कारण इस मिसाइल को दुश्मन के उपग्रह की निगाहों से भी बचाया जा सकता है। भारत के पास यह सबसे लंबी दूरी का निशाना साधने वाली मिसाइल हो गई है। इसके जरिए हम दुश्मन देश के उपग्रह भी नष्ट करने में सक्षम हो गए हैं। यह चीन की दंडपेंग मिसाइल का जबाव देने में भी सक्षम है। हालांकि हमारा जन्मजात दुश्मन देश पाकिस्तान भी मिसाइल निर्माण के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहा है। उसके पास शाहीन-एक, 700 किलोमीटर, शाहीन-दो, 2000 किलोमीटर और शाहीन-तीन, 2750 किलोमीटर मारक क्षमता की मिसाइलें तैयार हैं। वह तैमूर नाम से 5000 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली मिसाइल तैयार करने में भी लगा है। अग्नि के निर्माण में कैनेस्तर तकनीक का इस्तेमाल किए जाने से जासूसी उपकरण और उपग्रह भी यह मालूम नहीं कर पाएंगे कि इसे कहां से दागा गया है और यह किस दिशा में उड़ान भर रही है। क्योंकि यह तीन चरणों में 800 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम है। इसलिए दुश्मन देश को इसे बीच में ही नष्ट करना नामुमकिन होगा। इसकी खासियत यह भी है कि इसे एक बार छोड़ने के बाद लक्ष्य साधने वाले सैनिक व वैज्ञानिक भी रोक नहीं पाएंगे। 50 टन वजनी इस मिसाइल में एक हजार किलोग्राम परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता है। इसकी लंबाई 17.5 मीटर और चौड़ाई 2 मीटर है। अमेरिका को छोड़ संपूर्ण यूरोप, एशिया और अफ्रीका इसकी मारक क्षमता के दायरे में होंगे। अग्नि 5 के सफल परिक्षण के बाद चीन समेत कई विकसित देशों ने यह आशंका जताई है कि इस परीक्षण के बाद एशियाई परिक्षेत्र में हथियारों का भण्डारण करने की होड़ लगेगी। हालांकि यह सच्चाई नहीं है।

पाकिस्तान, ईरान व कोरिया पहले से ही मिसाइलों के निर्माण और उनके परीक्षण में लगे हैं। विकसित व घातक हथिायारों के कारोबार में लगे देश भी अपने हथियारों को बेचने के लिए कई देशों को उकसाने में लगे रहते हैं। आज पूरी दुनिया के लिए भस्मासुर साबित हो रहे इस्लामिक आंतकवादियों को हथियार मुहैया कराने का काम यूरोपीय देशों ने अपने हथियार खपाने के लिए ही किया था। पाकिस्तान पोषित कश्मीर में आतंकवाद और ओड़ीसा व छत्तीसगढ़ में पसरा चीन द्वारा पोषित माओवादी उग्रवाद ऐसी ही बदनीयति का विस्तार हैं। हालांकि इस परीक्षण के बाद भारत के प्रति कालांतर में कई देशों की सामारिक रणनीति में बदलाव देखने को मिल सकता है। भारत में एकीकृत विकास कार्यक्रम की शुरूआत 1983 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुई थी। इसका मुख्य रूप से उद्देश्य देशज तकनीक व स्थानीय संसाधनों के आधार पर मिसाइल के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना था। इस परियोजना के अंतर्गत ही अग्नि, पृथ्वी, आकाश और त्रिशूल मिसाइलों का निर्माण किया गया। टैंको को नष्ट करने वाली मिसाइल नाग भी इसी कार्यक्रम का हिस्सा है। पश्चिमी देशों को चुनौती देते हुए यह देशज तकनीक भारतीय वैज्ञानिकों ने इंदिरा गांधी के प्रोत्साहन से इसलिए विकसित की थी, क्योंकि सभी यूरोपीय देशों ने भारत को मिसाइल तकनीक देने से इनकार कर दिया था। भारत द्वारा पोखरण में किए गए पहले परमाणु विस्फोट के बाद रूस ने भी उसे आरएलजी तकनीक को देने से मना कर दिया था, किंतु एपीजे अब्दुल कलाम की प्रतिभा और सतत सक्रियता से हम मिसाइल क्षेत्र में मजबूती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते रहे हैं। अब्दुल कलाम की सेवानिवृत्ति के बाद इस काम को गति महिला वैज्ञानिक टीसी थॉमस ने दी हुई है। थॉमस आईजीएमडीपी में अग्नि 5 अनुसंधान की परियोजना निदेशक हैं। उन्हें भारतीय प्रक्षेपास्त्र परियोजना की पहली महिला निदेशक होने का भी श्रेय हासिल है।

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