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क्यों अचानक चल पड़ा सबूत दिखाओ अभियान

[dropcap]ए[/dropcap]क ओर भारतीय सेना में बार-बार उनपर हमले करके उनके पराक्रम को चुनौती देने वाले पाकिस्तान को मज़ा चखाने का अभियान चल रहा है तो वहीं दूसरी ओर देश की राजनीति में ‘सबूत दिखाओ’ अभियान का ज़ोर चल रहा है। इस अभियान के नायक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने जैसे ही झंडा उठाया उन्हें उन्ही के रेस में पछाड़ने वाले एक के बाद एक बयानवीर सामने आने लगे। मात्र सबूत मांगने से भरपूर TRP न मिलती देख संजय निरुपम सर्जिकल स्ट्राइक को फ़र्ज़ी करार देने लगे। कांग्रेस के नए सहयोगी जदयू के महासचिव और प्रवक्ता अजय आलोक तो रेस जीतने के चक्कर में यह भी भूल गए कि उड़ी हमले में शहीद हुए कई जवान बिहार के ही थे। ये सभी नेता/प्रवक्ता उन पार्टियों से सम्बन्ध रखते हैं जिनके शीर्ष नेतृत्त्व ने LoC आपरेशन का समर्थन ही नहीं बल्कि सरकार के साथ खड़े होने की बात भी कही थी।

तो फिर दो तीन दिन में ऐसा क्या हुआ जिसके चलते इन दलों में सरकार का समर्थन -करते ‘सबूत दिखाओ’ का शोर उठने लगा? इसके पीछे की राजनीति को समझने के लिए देश भर में सर्जिकल स्ट्राइक के प्रति प्रतिक्रिया को समझना ज़रूरी है। सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी देने वाले DGMO की प्रेस कांफ्रेंस से देश में एक अदम्य उत्साह का संचार हुआ। क्या युवा, क्या वृद्ध, सबने महसूस किया कि वैसे तो भारतीय सेना निरंकुश न होते हुए भी उसके पराक्रम में कोई कमी नहीं। मगर आज देश ने एक ऐसा नेतृत्व पाया है जो सेना के साथ वॉर रूम में खड़े होकर दुश्मन को सबक़ सिखाने का फैसला लेने में हीला-हवाली नहीं करता। भारत आक्रांता नहीं मगर अपने अपमान का बदला ठोक कर लेगा और लिया।

इस एक ख़बर ने देश की फ़िज़ा ही बदल दी। हर कायराना आतंकी हमले के बाद ‘कड़ी निंदा’ के अभ्यस्त देशवासियों के लिए मिलिट्री ऑपरेशन सुखद आश्चर्य था। देश की परंपरा के मुताबिक़ राजनीतिक दलों ने सूचना का स्वागत किया और अपना समर्थन जताया। यह वही परंपरा थी जिसके तहत 1971 के बाद जन संघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी को दुर्गा कहा था। पाकिस्तान के कुछ जाने माने पत्रकार, लेखकों ने भारत में नज़र आ रही राजनीतिक एकता का हवाला देकर अपने देश में इमरान ख़ान जैसे नेताओं को लताड़ भी दिया।

लेकिन पिछले दो दिनों के घटनाक्रम ने साफ़ कर दिया है कि इस राजनीतिक एकता की उम्र सीमित थी। वैसे तो यह उम्मीद करना ही अव्याहवारिक है कि इस तरह की राजनीतिक एकता टिक पायेगी। मगर देश की सुरक्षा के मुद्दे को देखते हुए लोग इन बयानों से हैरान भी हैं और क्षुब्ध भी। दरअसल सर्जिकल स्ट्राइक ने जहाँ सेना का मनोबल बढ़ाया, वहीँ देश में नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन की एक नयी लहर का संचार किया। पार्टियों को अपने नेटवर्क के माध्यम से यह भी मालूम हो गया कि समर्थन को कोई राजनीतिक लाभ उनके पाले में नहीं आ सकता। कारण साफ़ है कि उसका श्रेय जनता उसी नेता को देगी जिसने यह फ़ैसला लिया और राजनीतिक डिविडेंड भी उसी के नाम होगा।

चंद दिनों पहले पिउ रीसर्च की रिपोर्ट ने यह साफ़ कर दिया था कि किस तरह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ढाई साल में सरकार के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद चरम पर है। ऐसे में विरोधी दलों के नेतृत्व के लिए यह सोचना स्वाभाविक है कि इस स्थिति से उन्हें क्या लाभ होगा? बात सिर्फ़ भारत-पाक की नहीं है। मौजूदा माहौल में दलों के लिए कोई और मुद्दा गरमाना भी आसान नहीं होगा मोदी के ख़िलाफ़। इन तमाम मुद्दों की एक ही काट मुमकिन थी और वो यह कि सेना पर सीधे सवाल न करके भी इस आपरेशन को सवालों के घेरे में ले लिया जाये। इस कोशिश में बीजेपी के उत्तर प्रदेश के पोस्टर ने आग में घी का काम कर दिया।

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लोकतंत्र में सवालों का जवाब देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। दिक़्क़त सिर्फ यह है कि ‘सबूत दिखाओ’ अभियान ने सेना की कर्तव्यनिष्ठा को ही कठघरे में खड़ा नहीं किया बल्कि पाकिस्तान की इस्टैब्लिशमेंट और मीडिया को एक मज़बूत हथियार भी थमा दिया।

कांग्रेस पार्टी के लिए किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर जितने-नेता-उतनी-वाणी का रिवाज पुराना है। भगवा आतंक, इशरत जहाँ, समझौता ब्लास्ट जैसे तमाम मुद्दों पर पार्टी के अलग-अलग नेता विरोधाभासी स्टैंड लेते रहे हैं। आरएसएस पर राहुल गाँधी अपने बयान में बार-बार यू टर्न लेते रहते हैं। शायद कांग्रेस के रणनीतिकार ऐसा करके देश में मौजूद अलग-अलग राजनीतिक धाराओं को एक साथ ख़ुश करना चाहते हैं। लोक सभा चुनाव में उनकी यह रणनीति तो किसी काम नहीं आई। उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों में कांग्रेस को इसका कितना लाभ मिलेगा ये तो अगले वर्ष पता चल जायेगा लेकिन पंजाब के तीन-चौथाई जनता के समर्थन का दावा करने वाले अरविन्द केजरीवाल अपने स्टैंड से किस वोट बैंक को खुश करना चाह रहे हैं यह तो वही जानें।

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By Smita Mishra

Adviser, Prasar Bharati

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