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कबीर के बहाने राज्यों और पंथों पर नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कुछ भी करते हैं, सुनियोजित तरीके से करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में मगहर में कबीरदास की मजार पर पहुंचने वाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन गए हैं। मगहर के बहाने उन्होंने एक तीर से कई निशाना साधा। महापुरुषों के नाम पर की जा रही राजनीति का पर्दाफाश तो किया ही, अपने प्रतिपक्षियों को घेरकर उन्होंने प्रदेश की जनता को वास्तविकता का आईना भी दिखाया। उन्होंने विपक्ष को सत्ता का लोभी भी करार दिया और ढोंगी भी बताया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि विपक्ष ने कबीरदास को पढ़ा ही नहीं। पढ़ते तो उनका मन, अपने में नहीं रमता। वे जनहित की चिंता करते। उन्होंने कहा कि महात्मा फुले, आंबेडकर, गांधी जी आदि सभी ने अपने-अपने तरीके से समाज को रास्ता दिखाया।

बाबा साहब आंबेडकर ने संविधान दिया। लोगों को समानता का अधिकार दिया। आज ऐसी धारा खड़ी की जा रही है जिससे कि समाज टूट जाए। कुछ राजनीतिक दल अशांति चाहते हैं। उन्हें लगता है कि समाज में जितना ही असंतोष बढ़ेगा, उतना ही उन्हें लाभ होगा। कबीरदास के बहाने उन्होंने विपक्ष को ढाई आखर प्रेम का पढ़ने और सामाजिक सोच का जानकार होने की भी नसीहत दी। विपक्ष को समाज के मनोवैज्ञानिक से जुड़ने की नसीहत देकर उन्होंने जनता को यह समझाने की भी कोशिश की कि स्वहित से ऊपर उठकर ही जनहित को तरजीह दी जा सकती है।

कबीरदास का 500वां प्राकट्य दिवस उनकी निर्वाणस्थली मगहर में मनाया गया। काशी और मगहर से कबीर का रिश्ता उनके अंतरंग से जुड़ा हुआ था। मोदी और योगी की मगहर यात्रा के अपने सियासी निहितार्थ हैं। काशी कबीरदास की जन्मस्थली और कर्मस्थली हो सकती है। वहां कबीर को ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग की प्राप्ति जरूर हुई, लेकिन निर्वाण योग तो उन्हें मगहर में ही मिला। वैसे कबीर से जुड़े लोग चाहते तो इस आयोजन को उनकी जन्मस्थली काशी में भी किया जा सकता था, लेकिन उनके अनुयायियों ने अगर इसके लिए मगहर का चयन किया तो जरूर इसके पीछे कोई गूढ बात होगी।

अगर यह जयंती काशी में मनाई जाती तो भी वहां के सांसद होने के नाते भी नरेंद्र मोदी को कबीर की विचारधारा को आगे बढ़ाने में मदद मिलती। कबीर जयंती काशी में मने या मगहर में, इससे कोई असर नहीं पड़ता लेकिन इस बहाने नरेंद्र मोदी ने चुनावी बिगुल तो फूंक ही दिया है। पूर्वांचल को तो उन्होंने साधा ही है, इससे उन्होंने कई राज्यों को भी चुनावी संदेश दिया है। कबीर के दोहों का जिक्र कर उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी निशाने पर लिया। समाजवाद और बहुजन की बात करने वालों को सत्तालोलुप और सिद्धांतहीन करार दिया। आपातकाल के बहाने उन्होंने कांग्रेस की आलोचना की, उसका साथ देने वाले राजनीतिक दलों की मुखालफत करने में भी वे पीछे नहीं रहे।

आपातकाल लगाने वालों और उसका विरोध करने वालों के मौजूदा साथ पर भी सवाल उठाने से नहीं हिचके। कंधे से कंधा मिलाकर कुर्सी झपटने की उनकी साजिशों पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष की चिंता देश और समाज के लिए नहीं, सिर्फ अपने और अपने परिवार के हितों के लिए है। उनका मन अपने आलीशान बंगलों में ही लगा रहता था। गरीबों के लिए मकान बनाने के मामले में वे अन्यमनस्क होकर बैठे रहते थे। ऐसे लोगों से उत्तर प्रदेश को सतर्क रहने की जरूरत है। मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक जैसी सामाजिक बुराई से निजात चाहती हैं। धमकियों की परवाह किए बिना इससे मुक्ति की मांग कर रही हैं, लेकिन सत्ता के लिए वोट बैंक का खेल खेलने वाले लोग इसमें रोड़े अटका रहे हैं। संसद में इसे पास नहीं होने दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कबीर की मजार पर चादर चढ़ाने के बाद 24 करोड़ की लागत से बनने वाली संत कबीर अकादमी की आधारशिला भी रखी। इसमें पार्क और पुस्तकालय के अलावा कबीर पर शोध भी होगा। प्रधानमंत्री ने संत रैदास, महात्मा फुले, महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव रामजी आंबेडकर का जिक्र कर दलितों और पिछड़ों के दिल के तार भाजपा से जोड़ने की कोशिश की है। बार-बार उन्होंने यह भी कहा कि इन महापुरुषों ने समाज में फैली असमानता को दूर करने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास किया। बाबा साहेब ने सबको बराबरी का अधिकार दिलाया। दुर्भाग्यवश कुछ लोग उन्हीं के नाम पर देश तोड़ने की राजनीति कर रहे हैं। उन्हें अंदाजा ही नहीं है कि संत कबीर, महात्मा गांधी और बाबा साहेब को मानने वाले हमारे देश का मूल स्वभाव क्या है?

कबीरदास की जयंती में शिरकत के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक धर्मों और अनेक राज्यों को साधने की कोशिश की है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,राजस्थान और गुजरात के चुनाव भी इस अकेले कार्यक्रम से प्रभावित होंगे, इसमें कोई शक नहीं है। दार्शनिक और नैतिक शिक्षा पर आधारित कबीर पंथ अब धार्मिक संप्रदाय में परिवर्तित हो चुका है। बड़ी तादाद में देश भर में कबीर के अनुयायी हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ के कई प्रमुख आश्रम और मठ हैं। कबीरपंथियों में हिंदू, मुसलमान, बौद्ध और जैन सभी धर्मों के लोग शामिल हैं। यह और बात है कि कबीर को मानने वालों में बहुतायत हिंदू हैं।

कबीरपंथ की दो प्रमुख शाखाएं हैं। प्रथम शाखा का केंद्र ’कबीरचौरा’ (काशी) है। इसकी एक उपशाखा मगहर में है। दूसरा केंद्र छत्तीसगढ़ में है, जिसकी स्थापना कबीरदास के शिष्य धर्मदास ने की थी। इसकी भी अनेक शाखाएं उपशाखाएं हैं। इनके अतिरिक्त कबीरपंथ की अनेक अन्य शाखाओं, उपशाखाओं का भी उल्लेख मिलता है। योगी आदित्यनाथ ने कबीर की मजार पर टोपी भले ही न पहनी हो लेकिन उसे अपने हाथ से पकड़ तो लिया ही, भले ही इस पर विपक्ष हाय-तौबा मचाए लेकिन मोदी और योगी ने मिलकर जनता को विपक्ष की सच्चाई का आईना दिखा दिया है।

विपक्ष भाजपा की टोपी उछालने में उलझा है लेकिन उसे पता भी नहीं है कि राजनीति की इन दोनों हस्तियों ने उसे कितना नुकसान पहुंचा दिया है। कबीरदास की जयंती में शिरकत कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई राज्यों में फैले कबीरपंथियों का दिल जीत लिया है और इसका असर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। एक तीर से प्रधानमंत्री ने कई निशाने साधे हैं।

दलित महापुरुषों की याद कर जहां उन्होंने दलितों का दिल जीतने की कोशिश की है, वहीं महात्मा गांधी के बहाने पिछड़ों के दिलों पर राज करने की भी उनकी कोशिश है। मोदी की मगहर यात्रा का भाष्य करने की जरूरत तो हमेशा ही रहेगी। विपक्ष के सभी किए धरे पर एक क्षण में पानी फेरने का दरअसल यह सुचिंतित प्रयास है जो राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी के स्तर पर ही मुमकिन है।

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