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कुढ़ती कांग्रेस का जुगाड़तंत्र

कर्नाटक में बीजेपी को सरकार बनाने से रोकने में सफल हो जाने पर कांग्रेस फूली नहीं समा रही है। 19 मई को नई दिल्ली में प्रेस वालों को सम्बोधित करते समय कांग्रेस अध्यक्ष के चेहरे पर जो खुशी फूट रही थी उस पर किसने गौर नहीं किया होगा? कर्नाटक और दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ता मिठाइयां बांटते देखे गए। आतिशबाजी की जा रही थी। सवाल किया जाना चाहिए कि यह उत्सव किस बात के लिए आयोजित किया जा रहा है। क्या कर्नाटक में कांग्रेस ने प्रचण्ड बहुमत हासिल कर सत्ता में वापसी की है? कर्नाटक में कांग्रेस ने जुगाड़ की राजनीति के बूते एक बार फिर सत्ता से चिपके रहने का प्रबंध किया है। वहां जनादेश किसी राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं आया है। सच तो यह है कि कर्नाटक के मतदाताओं ने कांग्रेस को सिरे से खारिज किया है। कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कामकाज के तरीके और सियासी तिकड़मबाजी को लेकर मतदाताओं में नाराजगी थी। कर्नाटक में सिद्धारमैया खुद चुनावी दुर्गति से बाल-बाल बचे। ऐसी दशा के लिए अकेले सिद्धारमैया ही नहीं, बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बराबर के जिम्मेदार हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान राहुल की बड़ी-बड़ी बातों से राज्य का मतदाता अप्रभावित सा रहा। कांग्रेस की 44 सीटें कम हो जाना साधारण बात नहीं है, लेकिन कांग्रेसियों में चिन्ता और शर्म की पतली सी लकीर तक नहीं दिख रही। आंकड़े बताते हैं कि 2013 के बाद से अब तक कांग्रेस सवा दो दर्जन चुनावों में पराजय का सामना कर चुकी है। राहुल गांधी के खाते में यह एक कीर्तिमान ही होगा। बहुत से लोगों ने ढाई दिन की उठा-पटक के दौरान गौर किया होगा कि जब बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए लिए कांग्रेस और जनता दल-सेक्युलर के दिग्गज जोड़तोड़ में लगे थे, उस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुप्पी साधे रहे। वे न तो टीवी स्क्रीन पर दिखे ना ट्विटर पर सक्रिय रहे। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष किस मुंह से मीडिया का सामना करते। कर्नाटक विधानसभा चुनावों के प्रचार अभियान के दौरान राहुल और सिद्धारमैया दोनों ही बीजेपी और जेडीएस पर बराबरी से हमले कर रहे थे। ये दोनों महानुभाव जेडीएस पर बीजेपी की बी टीम होने का आरोप लगा रहे थे। कांग्रेस और जेडीएस के नेता एक-दूसरे को पानी पी-पी कर कोस रहे थे। कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद का ऑफर मिलते ही सारा कहा-सुना माफ हो गया। विश्वासमत के पहले ही मुख्यमंत्री पद से येदिदुरप्पा के इस्तीफे से कांग्रेस और जेडीएस का खुश होना समझ में आता है। लेकिन, उनके साथ तृणमूल कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी, बीएसपी, समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्टों के सामूहिक लोकतंत्र विजय-गान से साबित हो गया कि इनमें बीजेपी को लेकर कितना खौफ है। विभिन्न कोनों में सुसुप्तावस्था में पड़े सेक्युलरिस्ट और डिजायनर पत्रकार चैतन्य हो उठे हैं। इन स्वयंभू विद्वानों से सवाल किया जाना चाहिए कि यहां लोकतंत्र की हार या जीत जैसी कोई बात कहां थी। खेल तो सत्ता के लिए संख्या बल के प्रबंध का था। हमारे लोकतंत्र में संख्याबल के आगे नैतिक बल पूर्व में भी अनेक अवसरों पर पराजित होता दिखाई दे चुका है। कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता में आने से रोक दिए जाने को लोकतंत्र की विजय निरूपित करने वाले अल्पबुद्धि विश्लेषकों से सवाल है कि अगर कांग्रेस और जेडीएस की लोकतंत्र के प्रति इतनी गहरी आस्था रही है तो उन्होंने अपने विधायकों को क्यों होटलों और रिसार्टों में बंधक सा बनाए रखा। उनके मोबाइल फोन क्यों छीन लिए गए थे।

लोकतंत्र और नैतिकता की दुहाई देने वाली कांग्रेस ने विधायकों को स्वविवेक से फैसला लेने की छूट क्यों नही दी। येदियुरप्पा के इस्तीफे के कुछ पल बाद ही राहुल गांधी प्रेस के समक्ष प्रकट हुए। वहां, उन्होंने जो कहा उसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस और विपक्षी दल अब भविष्य में बीजेपी को रोकने और सत्ता से बाहर करने में सफल होंगे। राहुल के इस कथन से क्या निष्कर्ष निकाला जाए? क्या उन्होंने मान लिया है कि बीजेपी का अकेले सामना करने की कुव्वत कांग्रेस में नहीं है? क्या नरेन्द्र मोदी के कद के सामने स्वयं के बौना होने की ग्रंथि उनमें विकसित हो गई है? और क्या वह क्षेत्रीय दलों के आगे घ़ुटने टेकने के लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं? इन सवालों के जवाब यदि हां में हैं, तब अगला प्रधानमंत्री बनने के उनके सपने का क्या होगा? जाहिर है कि कई राज्यों में मोदी और बीजेपी का सामना करने के लिए राहुल गांधी को क्षेत्रीय क्षत्रपों से उन्हीं की शर्तों पर समझौता करना होगा। ऐसा होने पर संभव है कि उनकी हैसियत कथित गठबंधन में बी टीम के अगुआ से अधिक नहीं होगी। यह भी एक बड़ा सवाल है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस क्या करेगी? तृणमूल कांग्रेस की अगुआ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर लेंगी।

केरल में वामपंथियों से कांग्रेस की सीधी टक्कर दशकों से चली आ रही है। उड़ीसा में बीजू जनता दल के साथ कांग्रेस के तालमेल के आसार नहीं हैं। महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार चुनावी राजनीति में शायद ही राहुल का साथ दें। वहां शिवसेना अगर कांग्रेस का साथ देती है तो वह अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने वाली हरकत कर बैठेगी। दिल्ली में क्या राहुल गांधी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का स्वप्र देखने लगे हैं? उत्तर प्रदेश में बीएसपी और एसपी कांग्रेस के साथ सहयोग कर लें तब भी वे ऐसे किसी तालमेल में कांग्रेस को तीसरे या चौथे क्रम में रखेंगी। अब रही बात बिहार की, वहां लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ कांग्रेस की दोस्ती है, लेकिन लालू को भ्रष्टाचार के मामलों में हुई सजा और लालू कुनबे पर लग रहे आरोपों को राज्य का मतदाता भूला नहीं है। बिहार में यह आम धारणा महसूस की जाती रही है कि राजद शासन काल में बिहार में पूरी व्यवस्था चौपट हो गई थी। इन तमाम तथ्यों पर विचार करने पर यही निचोड़ सामने आता है कि कांग्रेस भले ही सपने बड़े-बड़े देखती रहे लेकिन उसके लिए राह आसान नहीं होगी। मैदानी स्तर पर कांग्रेस को मजबूत करने पर ही राहुल बीजेपी को कड़ी चुनौती देने के बारे में सोच सकते हैं। संदेह नहीं कि मोदी आंधी से बौखलाए राजनीतिक दलों को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव परिणामों और अब कर्नाटक में जनता दल-सेक्युलर और कांग्रेस के बीच गठबंधन से भविष्य में बीजेपी से मुकाबला करने के लिए दिशा दिखाई दी है। फिर भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि 2019 बीजेपी के लिए भारी साबित होने वाला है। विपक्ष के तमाम दुष्प्रचार के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता काफी हद तक जस की तस है। मतदाताओं का बड़ा वर्ग मोदी विरोधियों के भाव, खेल और तिकड़मों से भली-भांति परिचित है। मोदी की लोकप्रियता की पुष्टि हाल में कुछ प्रतिष्ठित मीडिया समूहों के सर्वे से हो चुकी है।

हिन्दुस्थान समाचार/अनिल बिहारी श्रीवास्तव

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