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बेहतरीन चार साल, लेकिन…

अगर हम यह मान लें कि देश के नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परा-मानव हैं, जो गलती कर ही नहीं सकते तो मीडिया या विश्लेषकों के लिए कोई काम हीं नहीं रह जाता, न ही संसद या जन-विमर्श की जरूरत पड़ेगी। हम नेता में देवत्व के गुण प्रतिष्ठापित करके आराम से बैठ सकते हैं भक्ति भाव से। लेकिन यह प्रजातंत्र के लिए, जनता के लिए और स्वयं नेता के लिए एक खतरनाक स्थिति हो सकती है लिहाजा हम विश्लेषकों के लिए यह जरूरी है एक सम्यक भाव रखते हुए नेता और उसके कार्यकाल की निरपेक्ष विवेचना करें। पूरी दुनिया में सत्ता का एक प्रमुख चरित्र होता है कि उसके इर्द गिर्द एक महिमा का वलय चक्र बन जाता है जो उसे न चाहते हुए भी जनता से दूर कर देता है। ऐसे में शासक के लिए भी उचित होता है कि वह धरातल से जुड़े निरपेक्ष विश्लेषण को तरजीह दे।

मोदी शासन के चार साल पूरे हुए और अगला एक साल चुनाव की तैयारियों का है। आइए, एक निरपेक्ष विश्लेषण के लिए तथ्यों पर गौर करें। एक ही दिन अखबारों में तीन खबरें थीं। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने देश के एक बड़े हिंदी दैनिक को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा, ‘जनता विकास चाहती है और भाजपा विकास करना जानती है।’ प्रजातंत्र को मजबूत करने में देश की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया का यह संदेश बेहद गंभीरतापूर्ण, समीचीन और शिक्षाप्रद है। दूसरी खबर में एक वीडियो वायरल हुआ और खबरों में आया जिसमें इसी पार्टी का एक सांसद किसी को आदेश दे रहा है ‘सभी गाड़ियां रोक दो। मुझे 10 मिनट में वैशाली एक्सप्रेस यहां चाहिए।’ इस ट्रेन से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पाण्डेय एक कार्यक्रम में भाग लेने उस स्टेशन पर आ रहे थे। वीडियो वायरल होने के कुछ घंटे बाद जब एक मीडियाकर्मी ने पूछा तो उनका जवाब था ‘मैं अपने एक कार्यकर्ता से बात कर रहा था न कि किसी रेल अधिकारी से’ यानी अपने बचाव में दिया गया जवाब पहले वाले से भी ज्यादा डरावना … कार्यकर्ता गाड़ी रोक सकता है या वैशाली एक्सप्रेस सांसद की इच्छानुसार मिनटों में इच्छित स्टेशन पर ला खड़ा कर सकता है? तीसरी खबर थी इसी पार्टी के एक विधायक ने अपनी एक जनसभा में बाल विवाह फिर से शुरू करने की वकालत इस आधार पर की कि ऐसा करने से ‘लव जेहाद’ रुक जाएगा। विधायक ने बाल विवाह निरोधक कानून को बीमारी बताई और इस कानून को खत्म करना निदान। 89 वर्ष पहले सन 1929 में जब ब्रितानी हुकूमत ने यह कानून बनाया था तो सन 1925 में केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली में उस समय भी कुछ हिन्दू सदस्यों ने जैसे टी रंगैयाचारी आदि ने इसका विरोध यह कहकर किया था कि अगर लड़की दस साल से अधिक की हो जाती है तो कोई उससे शादी नहीं करता-खासकर जमींदार। आज कई दशकों बाद एक विधायक भी उसी कानून को बीमारी की जड़ बता रहा है। यह कुछ ऐसा ही समाधान है कि अगर बलात्कार हो रहा है तो लड़कियों को घर से बाहर पढ़ने भेजते ही क्यों हो? ये सांसद या विधायक अगर उसी शिद्दत से, जिससे ट्रेन रुकवाने का माद्दा रखते हैं, प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर सरकारी तंत्र से अमल करवाते तो मोदी का शासन दुनिया में एक आदर्श शासन माना जाता। लेकिन ये शायद ही अपने क्षेत्र में मोदी के कार्यक्रम और नीतियों के बारे में जनता को बताने गए हों या ठीक से जानते भी हों। लेकिन सुशासन पर कलंक के रूप में अपनी मोहर जरूर लगा दे रहे हैं।

किसी शासनकाल की अच्छाई या बुराई का आंकलन तीन तरीके से किया जाता है- पहला, क्या उसी अवधि के तत्काल पहले के शासन काल से यह काल बेहतर रहा है। दूसरा, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में वोट लेते समय जो वादे किये थे उन्हें किस हद तक पूरा किया गया है, और तीसरा, जनता का इस नेता और उसके शासन काल के प्रति क्या भाव है? भारत में चूंकि प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रजातंत्र की व्यवस्था है और समाज में गरीबी एक बड़ी समस्या रही है लिहाजा आमतौर पर चुनाव में कई वादे आर्थिक और डिलीवरी के स्तर पर होने वाली समस्याओं को नजरअंदाज करके किए जाते हैं, अत: शासन में आने के बाद उन्हें पूरी तरह मुकम्मल करना संभव नहीं होता। ऐसे में विश्लेषण करते समय यह भी देखना होता है कि सरकार की नीयत क्या रही है और आर्थिक कारक कौन से हैं जो एक निश्चित समय में उन्हें पूरा करने में बाधक रहे और साथ ही उन्हें अमल में लाने के लिए लगी नीचे की मशीनरी जो आदतन अकर्मण्य भी रही है और भ्रष्ट भी, वह डिलीवरी में बाधक तो नहीं बनी रही? इसमें दो राय शायद ही हो कि मोदी के शासनकाल में भ्रष्टाचार में परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर शासकीय लिप्तता लगभग शून्य रही है। मंत्रियों के स्तर पर ही नहीं, केंद्र सरकार के कार्य में कोई ऐसी घटना नहीं हुई जिसे भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जा सके। अगर नीरव मोदी ने बैंक घोटाला किया तो वह भी पकड़ा गया इसी काल में। साथ ही कई योजनाएं एक शिद्दत के साथ शुरू की गयीं -जैसे फसल बीमा योजना, नीम-लेपित यूरिया, मृदा परीक्षण, स्टार्ट-अप इंडिया, मेक इन इंडिया, नोटबंदी, जीएसटी, उज्ज्वला आदि-आदि। इनमें से कुछ अर्थव्यवस्था को बेहतर करने के लिए तो कुछ जन कल्याण के लिए थीं। अगर गौर से देखें तो हम पाएंगे कि चूंकि भारत के संविधान में एक अर्द्ध-संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था है, अत: इनमें से अधिकांश योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब संबंधित राज्य सरकारें भी उसी उत्साह से अपने अभिकरणों को कार्य-निष्ठ और भ्रष्टाचार-शून्य बनाते हुए इन योजनाओं का क्रियान्वयन करें। फसल बीमा योजना अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी तो इसके पीछे राज्य सरकारों की अकर्मण्यता ही रही है जो अब धीरे -धीरे दूर हो रही है तब जबकि भाजपा अपने सहयोगियों के साथ 20 राज्यों में आ चुकी है।

लिहाजा विश्लेषण के पहले दो उपादान, पिछली सरकार के 2010 से 2014 तक का काल, जिसमें घोटाले पर घोटाले जन विमर्श को सामूहिक अवसाद की ओर बलात ले गए, के मुकाबले मोदी का चार साल अपेक्षाकृत भ्रष्टाचार मुक्त माना गया। दूसरा, वादे मुकम्मल करने के लिए नीतियां बनीं और सरकार की नीयत पर कोई शक नहीं रहा लिहाजा जनता में आज भी औसत रूप से संतोष बना रहा। यह संतोष तब भी बना और बढ़ा जब प्रधानमंत्री ने अचांदी घोषित की। तमाम तकलीफों के बावजूद जनता में यह विश्वास पनपा कि ‘भ्रष्ट अधिकारी और अनैतिक टैक्स चोर सेठों का अब बचना मुश्किल है।’ लेकिन जनसंवेदनाएं तब आहत होने लगती हैं, जब सत्ताधरी दल का सांसद ट्रेन रुकवाने के आदेश देने लगता है या कोई विधायक लव जिहाद (जो कभी भी सिद्ध नहीं हो सका है ) खत्म करने के नुस्खे के रूप में बाल विवाह फिर शुरू करने की पुड़िया थमाने लगता है। जनता मोदी के नेतृत्व वाली पार्टी में सांसद को किसी ऐसे दबंग नेता के रूप में नहीं देखना चाहती, जो कोई सड़कछाप कानूनभंजक के रूप में दरोगा को पीटता नजर आए, क्योंकि उसने उसकी गाड़ी का चालान काटने की ‘हिमाकत’ की। मोदी के शासन काल की निरपेक्ष विवेचना करने वाला कोई भी व्यक्ति इसे गलत और सबसे अधिक मोदी की छवि के लिए नुकसानदायक बताएगा। यहां हम स्वतंत्र विश्लेषकों को भी सतर्क रहना होगा जब विश्लेषकों का एक वर्ग कब्रिस्तान के लिए जमीन दिए जाने को तो तत्कालीन अखिलेश सरकार की धर्म-निरपेक्ष राजनीति बताता है। लेकिन वहीं अगर चुनावी सभा में मोदी उसका जिक्र भर भी कर दें तो उससे सांप्रदायिकता की बू आने लगती है। मोदी को शायद यह चर्चा नहीं करनी पड़ती अगर हम निरपेक्ष विश्लेषक इस बात को लेकर पिछले 70 साल में किसी दिग्विजय, किसी ओवैसी , किसी आजम खान या किसी मायावती, मुलायम या लालू की आलोचना कर रहे होते। चुनाव के ठीक पहले कोई कांग्रेसी मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी जब मुसलमानों को आरक्षण दे देता है (यह पूरी तरह से जानते हुए कि अदालत में यह आदेश नहीं ठहरेगा) तो क्या हमें उसे धर्म-निरपेक्षता का चोला पहनाते हुए अपने को ईमानदार विश्लेषक बताने के लिए चुप रहना चाहिए था? तीन तलाक की इस्लामी व्यवस्था सभ्य समाज पर एक बदनुमा दाग है। लेकिन क्या किसी वाम चिंतक को इसके खिलाफ तलवार ताने देखा गया? अगर वर्तमान सरकार इसके खिलाफ कानून लाए तो उसे सांप्रदायिकता की राजनीति कहकर हम विश्लेषकों को मोदी की आलोचना करनी चाहिए? तत्कालीन राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार सन 1986 में मुसलमान पुरुषों को खुश करने के लिए मुस्लिम महिला विरोधी कानून बनाती है ताकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला निष्प्रभ हो सके। सर्वोच्च अदालत ने तलाकशुदा शाहबानो के गुजारा भत्ता के लिए अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत आदेश किया था जो मौलवियों को नागवार लगा।

मुसलमानों के वोट के लिए इस आदेश को निष्प्रभ करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ को बहाल रखते हुए तत्कालीन राजीव सरकार एक नया कानून बनाती है, जिसका नाम मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार अभिरक्षण) कानून है -जो महिलाओं के खिलाफ है, लेकिन जिसका नाम मुस्लिम महिला अभिरक्षण रखा गया) तो वह धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक हो जाता है। यानी राजीव गांधी या अखिलेश यादव कानून बदलें ताकि मुस्लिम पुरुष समाज खुश होकर वोट दे तो वह धर्मनिरपेक्षता। लेकिन मोदी तीन तलाक के खिलाफ कानून लाएं तो वह घोर सांप्रदायिकता। मोदी की जन स्वीकार्यता उस भरोसे की वजह से है जो जनता को काफी अरसे बाद हुआ है। वह भरोसा इस बात का नहीं है कि वह राम मंदिर बनवाएंगे बल्कि इस बात का कि इस व्यक्ति में भारत को बदलने की क्षमता है। इसका व्यक्तित्व भ्रष्टाचार या सत्ता-जनित दोषों से परे है, लेकिन तब अगर भाजपा का एक सांसद ट्रेन रोकने का आदेश देता है या दूसरा सांसद हिन्दुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह देता है या कोई विधायक लव जिहाद रोकने का फार्मूला बाल विवाह में देखता है तो दो बातें तय हो जाती हैं कि इस विचारधारा वाली पार्टी में दोयम दर्जे पर नेताओं के चुनाव गलत हो रहे हैं या सत्ताजनित दोष इस स्तर पर पैठ बनाने लगा है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ठीक ही कहा कि जनता विकास चाहती है और उनकी पार्टी विकास करना जानती है। फिर ये सांसद, विधायक या फिर गौरक्षक, वन्देमातरम के अलमबरदार या पहलू खान, जुनैद या अखलाक को मारने वालों की अक्ल पर पर्दा क्यों पड़ा है? अभी भी एक साल का वक्त है। पूरा जन संवाद बदलना होगा और अमित शाह की बात को आप्तवचन मानते हुए विकास के कार्यों को रफ्तार देनी होगी। अन्यथा जो विश्लेषण का तीसरा उपादान है यानी जनता का नेता पर भरोसा, उसे चोट पहुंचेगी, समाज बंट जाएगा न केवल हिन्दू -मुसलमान में बल्कि जातियों में।

हिन्दू तासीरन उदार होता है और जैसे ही आक्रामक हिंदुत्व के प्रतीक सड़कों पर लम्पटवादी सोच के रूप में सर पर केसरिया साफा बांधे डराने के भाव में दिखाई देने लगते हैं तो वह जाति के खांचे में फिर वापस चला जाता है मुलायम, मायावती और लालू की लम्पटवादी दुनिया में। इसे गहरे से समझना ही नहीं तत्काल रोकना होगा। मोदी की जन स्वीकार्यता उस भरोसे की वजह से है जो जनता को काफी अरसे बाद हुआ है। वह भरोसा इस बात का नहीं है कि वह राम मंदिर बनवाएंगे बल्कि इस बात का कि इस व्यक्ति में भारत को बदलने की क्षमता है। इसका व्यक्तित्व भ्रष्टाचार या सत्ता-जनित दोषों से परे है। भापजा के ये सांसद या विधायक अगर उसी शिद्दत से, जिससे ट्रेन रुकवाने का माद्दा रखते हैं, प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर सरकारी तंत्र से अमल करवाते तो मोदी का शासन दुनिया में एक आदर्श शासन माना जाता। लेकिन ये शायद ही अपने क्षेत्र में मोदी के कार्यक्रम और नीतियों के बारे में जनता को बताने गए हों या ठीक से जानते भी हों लेकिन सुशासन पर कलंक के रूप में अपनी मोहर जरूर लगा दे रहे हैं।

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