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चंदा कोचर पर घोटाले का फंदा

पीएनबी घोटाले का खुलासा होने के बाद कई बैंक घोटालों का खुलासा हो चुका है। लेकिन जिस मामले ने लोगों को सबसे ज्यादा चौंकाया है वो है आईसीआईसीआई बैंक-वीडियोकॉन घोटाला। इस मामले में शक की सुई पद्म सम्मान से सम्मानित बैंक की सीईओ और प्रबंध निदेशक चंदा कोचर की ओर घूम चुकी है। जिसकी वजह से सीबीआई ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिया है। इस मामले में मुख्य आरोपी चंदा कोचर के पति दीपक कोचर, दीपक के भाई राजीव कोचर और वीडियोकॉन ग्रुप के मालिक वेणुगोपाल धूत को बनाया गया है। माना जा रहा है कि चंदा कोचर ने अपने पद का इस्तेमाल कर इनलोगों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाया।

इस मामले में सीबीआई ने प्रारंभिक जांच के बाद वेणुगोपाल धूत और दीपक कोचर को पूछताछ के लिए नोटिस भी दिया है, जबकि दीपक कोचर के भाई राजीव कोचर को हिरासत में लेकर पूछताछ किया जा चुका है। राजीव कोचर को गुरुवार को उस इमिग्रेशन अथॉरिटी के अधिकारियों ने मुंबई एयरपोर्ट पर उस वक्त हिरासत में लिया था, जब वो विदेश के लिए रवाना होने वाले थे।

इस मामले में बैंक के निदेशक मंडल ने अपनी प्रबंध निदेशक और सीईओ चंदा कोचर पर पूरा भरोसा जताया है। लेकिन अभी तक हुई जांच में चंदा कोचर की भूमिक संदिग्ध मानी जा रही है। ये मामला एक निवेशक अरविंद गुप्ता द्वारा पीएमओ को लिखे एक पत्र से सामने आया। इस शिकायत को पीएमओ ने इस शिकायत को गंभीरता से लिया और मामले की जांच शुरू करवायी, जिसके बाद सवा तीन हजार करोड़ रुपये के इस घोटाले का खुलासा हुआ।

बताया जा रहा है कि वीडियोकॉन ग्रुप के मालिक वेणुगोपाल धूत ने चंदा कोचर के पति दीपक कोचर और उनके दो रिश्तेदारों के साथ मिलकर 2008 में न्यूपावर रिन्यूएबल प्राइवेट लिमिटेड (एनआरपीएल) के नाम से एक कंपनी बनायी। धूत की इसमें धूत पचास फीसदी की हिस्सेदारी थी, जबकि शेष हिस्सेदारी दीपक कोचर और उनके रिश्तेदारों की थी। जनवरी 2009 में धूत ने कंपनी के निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया और अपने अपने हिस्से के शेयर ढाई लाख रुपये में ट्रांसफर कर दिया। मार्च 2010 में वीडियोकॉन ग्रुप की ही एक कंपनी सुप्रीम इनर्जी ने कंनवर्टिबल डिबेंचर के रूप में एनआरपीएल को 64 करोड़ रुपये का लोन दिया। इसी महीने दीपक कोचर और उसके रिश्तेदारों ने अपनी अधिकतम हिस्सेदारी सुप्रीम इनर्जी को ट्रांसफर कर दी। इसके बाद नवंबर में सुप्रीम इनर्जी ने पूरी हिस्सेदारी धूत के सहयोगी महेशचंद्र पुगलिया को ट्रांसफर कर दिया। इसमें बड़ा खेल सितंबर 2012 से लेकर अप्रैल 2013 के बीच हुआ, जब पुगलिया ने एनआरपीएल की पूरी हिस्सेदारी कोचर दंपत्ति के ट्रस्ट पिनाकेल इनर्जी, जिसके चेयरमैन दीपक कोचर हैं, को सिर्फ नौ लाख में ट्रांसफर कर दिया। इस पिनाकेल इनर्जी ट्रस्ट के चेयरमैन चंदा कोचर के पति दीपक कोचर ही हैं। इस तरह से एनआरपीएल का मालिकाना हक पूरी तरह से कोचर परिवार के ट्रस्ट के पास आ गया।

इस मामले में 2012 तक आईसीआईसीआई बैंक का कोई प्रत्यक्ष रोल नहीं था। जांच में पता चला है कि वीडियोकॉन ग्रुप ने अपनी विस्तार योजनाओं के लिए 40 हजार करोड़ के लोन के लिए अप्लाई किया। कर्ज की राशि काफी बड़ी होने के कारण एसबीआई के नेतृत्व वाले बीस बैंकों के कंसोर्टियम (समूह) में इसपर विचार किया गया और अप्रैल 2012 में कर्ज को मंजूर कर लिया गया। इस कर्ज में आईसीआईसीआई बैंक की हिस्सेदारी 3,250 करोड़ रुपये की थी। अप्रैल में लोन मंजूर हुआ और छह महीने में ही धूत के साथी पुगलिया ने एनआरपीएल की हिस्सेदारी चंदा कोचर के पारिवारिक ट्रस्ट पिनैकल इनर्जी को ट्रांसफर कर दिया।

दूसरी ओर लोन मिलने के बाद वीडियोकॉन ने कुछ समय तक तो नियमित रूप से किश्त चुकाता रहा, फिर बाद में उसने भुगतान करना रोक दिया। वीडियोकॉन ने कर्ज के 2810 करोड़ रुपये बैंक को नहीं लौटाये, जिसकी वजह से 2017 में बैंक ने इसे एनपीए घोषित कर दिया। माना जा रहा है कि वीडियोकॉन को लोन देने के लिए चंदा कोचर ने कंसोर्टियम पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उसके एवज में ही महेश चंद्र पुगलिया ने एनआरपीएल की अपनी पूरी हिस्सेदारी पिनैकल इनर्जी ट्रस्ट के नाम ट्रांसफर की।

हालांकि मामले का खुलासा होने के बाद आईसीआईसीआई बैंक की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया कि वीडियोकॉन ग्रुप को लोन देने के लिए हुई कंसोर्टियम की बैठक में चंदा कोचर शामिल नहीं थीं, इसलिए उनपर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने का आरोप लगाना गलत है। सभी तथ्यों के मद्देनजर बैंक इस नतीजे पर पहुंचा है कि भ्रष्टाचार की जो अफवाहें चल रही हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है। इस तरह की अफवाह आईसीआईसीआई बैंक की साख खराब करने के लिए फैलाई जा रही है। बैंक से चंदा कोचर को जरूर समर्थन मिल गया है लेकिन मामले की जांच में जुटी एजेंसियां अभी भी उनको संदिग्ध मानकर ही अपनी जांच आगे बढ़ा रही हैं।

वीडियोकॉन-आईसीआईसीआई बैंक घोटाले की शिकायत आरबीआई को पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल में ही मिल गयी थी। शिकायत की प्रति रघुराम राजन के साथ ही सेबी के चेयरमैन यूके सिन्हा, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के पास भी भेजी गयी थी। लेकिन तब आरबीआई ने इसे जांच के योग्य मामला नहीं माना था। लेकिन पीएमओ की पहल पर जब जांच एजेंसियों ने काम शुरू किया, तो घोटाले की परतें खुलती चली गयीं।

इस मामले में सीबीआई ने कुछ दिन पहले ही आईसीआईसीआई बैंक के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से भी पूछताछ की थी। बताया जा रहा है कि सीबीआई द्वारा अभी तक जब्त किये गये दस्तावेजों के अध्ययन और बैंक अधिकारियों से हुई पूछताछ के आधार पर संकेत मिल रहे हैं कि वीडियोकॉन को दिये गये कर्ज के लिए उच्चाधिकारियों की ओर से रजामंदी दी गयी थी। इसके लिए बैंकिंग रूल्स की अनदेखी भी की गयी थी।

चंदा कोचर की परेशानी वीडियोकॉन मामले के साथ ही उनके पति दीपक कोचर के भाई राजीव कोचर की कंपनी के क्रियाकलापों को लेकर भी बढ़ने लगी हैं। राजीव कोचर सिंगापुर में बैंक लोन को रिस्ट्रक्चर कराने वाली एक कंपनी अविस्टा एडवाइजरी के मालिक हैं। जांच में पता चला है कि अविस्टा एडवाइजरी ने वीडियोकॉन ग्रुप, जीटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर, जेएसएल, जयप्रकाश पावर वेंचर्स, सुजलॉन जैसी कंपनियों के लोन को रिस्ट्रक्चर करवाने का काम किया है। ये सारी कंपनियां आईसीआईसीआई बैंक से कर्ज ले चुकी हैं। अविस्टा एडवाइजरी ने पिछले कुछ सालों में अपनी क्लायंट कंपनियों के 1.7 करोड़ डॉलर के लोन को रिस्ट्रक्चर कराया है। जांच एजेसियों का मानना है कि चंदा कोचर ने ही बैंक से लोन लेने वाली कंपनियों को अविस्टा एडवाइजरी की सेवा लेने की सलाह दी थी, जिसके बाद अविस्टा ने इन कंपनियों के लोन को रिस्ट्रक्चर कराया और उसके एवज में भारी भरकम फीस ली। बहरहाल, सीबीआई घोटाले की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही है और जल्दी ही इसके दोषियों के चेहरे बेनकाब होने की संभावना है।

हिन्दुस्थान समाचार/योगिता पाठक

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