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हिन्दी के विदेशज शब्द कहीं आपको भारत से दूर तो नहीं कर रहे?

सरलीकरण के नाम पर कई ऐसे शब्द अनायास ही हमारी हिन्दी के अभिन्न अंग बन गए जिनके अर्थ में भारतीयता के प्रति घृणा, द्वेष या तिरस्कार निहित है

उस दिन मैंने एक पोस्ट लिखी थी अनुवाद और धार्मिक अनुवाद को लेकर। वास्तव में मुद्दा उसमे दूसरा था, सभी मित्रों ने उसे अपने अपने हिसाब से लिया, और उसमें अनुचित कुछ नहीं। आज उसे थोड़ा विस्तार देते हैं और बात करते हैं कि कैसे अनुवाद आपको अपनी संस्कृति से घृणा करना सिखाता है। कैसे कुछ शब्द आपको स्वयं से दूर कर देते हैं। अनुवाद और वह भी धार्मिक-राजनीतिक अनुवाद एक ऐसा टूल है जो कुछ न करते हुए भी आपको एकदम से काट देता है, जड़ कर देता है। यही कारण है कि अनुवाद यहाँ तक कि बाजार का अनुवाद करते समय भी तमाम तरह की सतर्कता का चयन करना आवश्यक है। हिन्दी से या हिन्दी में अनुवाद इस सिद्धांत में अपवाद नहीं हो सकता।

हम लोगों ने एक शब्द बहुत आम सुना है — ‘काऊ बेल्ट’! गाय की पट्टी के निवासी हैं! यह गाय की पट्टी क्या हुआ? यह कैसा शब्द है? और जो काऊ बेल्ट के निवासी हैं वह पिछड़े कैसे हो गए? कैसे गंवार शब्द पिछड़ेपन का प्रतीक बन गया? ऐसे कई प्रश्न है जो अवधारणात्मक अनुवाद में आपको मिलेंगे।

स्वयं के प्रतीकों पर लज्जित होने की यह कहानी हमारे धर्म ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद और फिर अनूदित धर्म ग्रंथों को स्रोत माने जाने के कारण आरम्भ हुई।

दो उदाहरण देती हूँ, उनसे आपको बात समझ आएगी। तुलसीदास रामचरितमानस में लिखते हैं

स्यामसुरभि पय बिसद, अति गुनद करहिं सब पान,

गिराग्राम्य सिय राम जस, गावहिं सुनहिं सुजान!

अर्थात काली गाय का दूध उज्जवल और अत्यंत गुणदायक जानकर भी सब पान करते हैं, उसी तरह गँवारी बोली में कहे गए सियाराम के यश को सज्जन लोग गान करते हैं और सुनते हैं।

मगर जब इसका अंग्रेजी अनुवाद होता है तो द रामायण ऑफ तुलसीदास में यह गंवारू अर्थात ग्राम्य भाषा को रफ भाषा कर दिया जाता है! इसके अनुवाद में लिखा गया है।

The milk cow can be black; its milk is white and very wholesome, and all men drink it and so, though my speech is rough, it tells the glory of Sita and Rama and will, therefore, be heard and repeated with pleasure be sensible people.

अंग्रेजों के लिए ग्राम का अर्थ पिछड़ा था, गाय एक पशु थी एवं हमारे यहाँ की व्यवस्था एक नई दुनिया। वनवासियों की दुनिया पर उन्होंने जो किताबें लिखी हैं, उन्हें आप पढ़िए तो आपको लगेगा कि वह कैसे हैरान और परेशान हैं, यहाँ की दुनिया देखकर छोटा नागपुर के ओरांस (the Oraons of Chhota Nagpur) में उराऊं की समृद्ध परम्परा देखकर हैरान हैं। वह यह देखकर हैरान हैं कि कैसे जंगलों में रहने वाले लोग धरती माता और सूरज का रिश्ता जोड़कर खुद को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध किए हैं। वह यौन स्वतंत्रता देखकर भी हैरान हैं।

अब जिनके लिए लोक भाषा का अर्थ ही rough भाषा है, वह किस तरह से ग्रामीण जीवन और उसके साथ ही साथ प्रकृति की निकटता को समझ पाएंगे। जिस भारत में उन्होंने कदम रखा वह भारत प्रकृति से प्रेम करने वाला भारत था, नदियों को पूजने वाला भारत था। (कृपया नदियों के सम्बन्ध में अभी की जा रही लापरवाही का उदाहरण न दें), वह जिस भारत में आए उसके सुदूर गावों में जो व्यवस्था थी वह उसके लिए पर्याप्त थीं।

मगर धीरे-धीरे जैसे जैसे हमारे इतिहास को अंग्रेजी में अनूदित किया गया और हमारे वनवासी इतिहास को अंग्रेजी में लिखा गया, तब से अंतर आना आरम्भ हुआ। जब से हिन्दी को सुगम बनाने के लिए उर्दूनिष्ठ शब्दों को जोड़ा जाने लगा तब से और भी ज्यादा समस्या का विस्तार हुआ। उर्दू का जन्म और विकास भले ही भारत में हुआ, यह भाषा भारत की तह तक नहीं पहुँच पाई क्योंकि यह मुसलमान आक्रांताओं की सुविधा के लिए उनकी अरबी, फ़ारसी और तुर्की को उत्तर भारत के ब्रज व अवधी के साथ मिलाकर सैनिकों की छावनी में प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा थी जो कई शताब्दियों तक मुग़लों के दरबार तक नहीं पहुँच पाई। और जब पहुँची, इसके आगे शहरों में ही चली, गाँवों तक कभी नहीं पहुँची जिससे कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति की भागीदार बन सके।

जिस भाषा को उर्दू के नाम से जाना जाता है, उसमें कई शब्द ऐसे इस्लामी मान्यताओं के आधार पर बने हैं जो अंतत: भारत के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। जैसे काफ़िर, जंग, ईमान आदि। कई बार बाज़ार के दबाव के कारण उर्दूनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करना पड़ जाता है, परन्तु honest का सच्चा अर्थ ईमानदार नहीं हो सकता। ईमान पूरी तरह मज़हबी शब्द है। जो भी व्यक्ति ईमानदार शब्द का प्रयोग honest के लिए करता है, वह इस शब्द के उद्गम के बारे में नहीं जानता।

ईमान वाला व्यक्ति अर्थात जिसने इस्लाम को मन और वचन दोनों से अंगीकार कर लिया है, उसे honest कैसे और किस सन्दर्भ में प्रयोग किया जा सकता है, यह एक प्रश्न है।

इसी प्रकार घर में कोई बच्चा बहुत चंचल हो तो हम उसे अनायास ही ‘बदमाश’ कह देते हैं। क्या आपको पता है कि ‘माश’ का अर्थ है ‘रोज़गार’ और जो समाजविरोधी तत्त्व नीति-विरुद्ध उपायों से पैसे कमाते हैं उन्हें बदमाश कहते हैं? जैसे चोर, डकैत, लुटेरे, आदि।

ऐसे ही कई और शब्द हैं और यह मूल लेखन के साथ भी हैं। उर्दू का शब्द मूलतः अरबी और फ़ारसी से सन्दर्भ लेता है जबकि हिन्दी का संस्कृतनिष्ठ शब्द संस्कृत से सन्दर्भ लेता है। जब हम अपने लेखन में या अनुवाद में बहुत आराम से सरलता से ‘काफ़िर’ शब्द का प्रयोग करने लगते हैं, या ‘प्रतिमा’ के स्थान पर ‘बुत’ का प्रयोग करने लगते हैं तो कहीं न कहीं अन्याय करते हैं। हम प्रतिमा को बुत से नहीं जोड़ सकते, उनके लिए बुत का अर्थ है शैतान की प्रतिमूर्ति, जबकि हमारे लिए प्रतिमा का अर्थ है हमने प्रतिमा में भी प्राण प्रतिष्ठा की है एवं तब पूजा की।

कहने का तात्पर्य यह है कि अपने लेखन और अनुवाद में जितना अधिक से अधिक हो सके, संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया जाए, जिससे हम अपनी संस्कृति से जुड़े रहें। शब्दों के माध्यम से तोड़ना हमारे लिए सबसे पहला चरण है।

विशेष कर पंजाब से अवध प्रांत तक हिन्दी के सरलीकरण के चक्कर में हिन्दी में तत्सम से अधिक विदेशज शब्दों का प्रयोग होने लगा, भाषा को सरल बनाने के नाम पर अंग्रेजी शब्दों को भी ठूंस दिया गया। इसके दो दुष्परिणाम देखने को मिले। एक तो बच्चे संस्कृत से दूर हुए और संस्कृत से दूर होते ही अपनी संस्कृति से दूर हो गए।

हिन्दी में सरलीकरण के नाम पर जो भी उर्दू के शब्द ठूंसे गए, उनका दुष्परिणाम आप नई पीढ़ी पर देखिये, जिसे ‘काफ़िर’ शब्द सहज लगता है, जिसे प्रतिमाओं को तोड़ना बहुत सामान्य सी बात लगती है। हिन्दी के साथ ही गयी इस घुसपैठ को हर मूल्य पर रोकना होगा। हमारे आपके जीवन में जो विधर्मी शब्द अतिक्रमण करके घुस आए हैं, उन्हें हटाना होगा। बच्चों को यह समझाना ही होगा कि इश्क, लव और प्रेम तीनों एक ही नहीं है। प्रेम व्यापक है, इश्क जिस्मानी है और लव, वह तो जैसे लस्ट का ही पर्याय आजकल बन गया है।

कहने को यह बहुत छोटा मुद्दा है, मगर शब्द ही हैं जिनके माध्यम से आपके बच्चों का भाषा से और धर्म से प्रथम परिचय होता है। उसे अंग्रेजी निष्ठ और उर्दू निष्ठ हिन्दी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का अध्ययन कराने की आवश्यकता है। अंग्रेजी आपको स्वयं से घृणा करनी सिखाएगी और उर्दू आपकी मूल अवधारणाओं पर ही प्रहार करेगी। क्योंकि हर भाषा की उत्पत्ति उसके मत और पंथानुसार ही होती है।

बुद्धिजीवियों द्वारा भारत की नई पीढ़ी के साथ किए जा रहे षड्यंत्र का यह प्रथम बिंदु है।

By Sonali Misra

स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार, उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं प्रकाशित हुआ है और शिवाजी पर उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य है; उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है

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