Categories
Article

मेरा अंदाज़ ही पहचान है

न्हीं के शब्दों में कहें तो “क्या कहेंगे उसे, जो कहीं न रहता हो मगर हर दिल में जिसका ठिकाना हो, जो कहीं न रुकता हो मगर जिसके लिए हर कोई रुक जाए। आप ही बताएँ क्या कहेंगे उसे? आवारा कहीं का? या आवारा कहीं का नहीं।” बस यही आवारगी, फ़ाक़ामस्ती और सहजता गुलज़ार को इंसानी बगीचे का वह फूल बनाती है जो जहाँ उगा वहाँ रह नहीं पाया, जहाँ पहुँचा वहाँ रुक नहीं पाया, जहाँ रुका वहाँ बिक नहीं पाया, इसलिए नहीं कि उसको ख़रीदार न मिले बल्कि इसलिए जो उसे ख़रीदने आये वे ख़ुद उसी के हाथों ख़ुद को बेच बैठे।

हिन्दीसिनेमा में फ़िल्मकार, गीतकार, संवाद लेखक और साहित्यकार गुलज़ार जैसाव्यक्तित्व रखने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। सफ़ेद झक कुरता-पायजामा, चेहरे पर मुस्कान, मृदुभाषी, हिन्दी और उर्दू का साफ़ उच्चारण,कहीं से पंजाबीपन की झलक तक नहीं। गुलज़ार से मिलो तो ऐसा लगता है कि ख़ुद से मिल लिए। बातों का सिलसिला कभी ख़त्म न होने पाए, ऐसी इच्छा होती है। गुलज़ार का बतौर गीतकार 1956 से शुरू हुआ सफ़र अभी तक जारी है और न सिर्फ़ गीतकार बल्कि पटकथा लेखक, संवाद लेखक, निर्देशक, कहानीकार और निर्माता के रूप में भी एक शानदार पारी वे खेल चुके हैं और अभी भी नई पीढ़ी को अपनी शायरी से सुकून दे रहे हैं। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, ग्रैमी अवॉर्ड, ऑस्कर, अनगिनत फ़िल्मफ़ेयर, अनेकों राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और पद्मभूषण पा चुके गुलज़ार अब पुरस्कारों के लिए गर्व के प्रतीक माने जाते हैं। मगर यहाँ तक पहुँचने का सफ़र इतना आसान भी नहीं था और छोटा भी नहीं।

बात मौजूदा पकिस्तान के झेलम ज़िले के छोटे से गाँव दीना से शुरू होती है, जहाँ 18 अगस्त 1936 को मक्खन सिंह कालड़ा के घर एक बच्चे को सम्पूरन सिंह कालड़ा नाम दिया गया, जो बाद में गुलज़ार में बदल गया। गुलज़ार अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान हैं। उनकी माँ उन्हें बचपन मे ही छोड़ कर चल बसीं। साल 1947 में विभाजन के बाद उनकापरिवार अमृतसर चला आया और यहीं से शुरू हुई गुलज़ार के सपनों की उड़ान, जो गुलज़ार को मुंबई खींच लाई।ज़िन्दगी की गाड़ी चलाने के लिए इस ख़ानाबदोश को वरली के एक मोटर गैराज में एकमकॅनिक की नौकरी भी करनी पड़ी।

mora gora ang laile
‘मोरा गोरा अंग लइले’

इसी दौर में गुलज़ार हिंदी फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करते रहे। सीखने की प्रक्रिया में गुलज़ार बिमल राय और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे निर्देशकों के क़रीब आये और उन्हें एक गीतकार के तौर पर पहला ब्रेक बिमल रॉय के निर्देशन में बन रही फ़िल्म बंदिनी से मिला जिसमें उन्होंने “मेरा गोरा रंग लइले, मोहे श्याम रंग दइदे” गीत लिखा। फ़िल्म आई, गीत मक़बूल हुआ, मगर गुलज़ार के संघर्ष का दौर अभी जारी था।

गुलज़ार गीतकार के तौर पर “हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू…” जैसे गीतों के दम पर धीरे-धीरे अपनी पहचान पुख़्ता कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने हेमंत कुमार, सलिल चौधरी, सचिन देव बर्मन और अन्य कई महान संगीतकारों के लिए गीत लिखे। साथ ही वे ऋषिकेश मुखर्जी, बिमल राय, बासु भट्टाचार्य जैसे दिग्गज निर्देशकों के सान्निध्य में फ़िल्म से जुड़ी हर बारीकी सीख रहे थे। बतौर निर्देशक उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म मेरे अपने 1971 में बनाई। फ़िल्म भावना प्रधान थी और दर्शकों ने इसे ख़ूब सराहा। इसके बाद उन्होंने एक से एक नए प्रयोग किये और दर्शकों के मन में अपनी अलग पहचान बना ली। उनका दर्शक वर्ग सीमित था मगर यह वो लोग थे जिन्हें गुलज़ार की फ़िल्म का इन्तज़ार रहता था।

tere bina
‘तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं…’

गुलज़ार की फिल्मों पर बांग्ला फ़िल्मों का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है। वही भाव प्रवणता, ज़मीन से जुड़े चरित्र, रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी आम तौर पर नज़रअंदाज़ कर दी जाने वाली कहानियों पर गुलज़ार ने फ़िल्में बनाई। कोशिश  में गूंगे-बहरेमाता-पिता की शादीशुदा जीवन में अनेकों कष्ट झेलने के बाद एक ही इच्छा है कि उनका बेटा उन जैसा नहीं हो। आंधी  फ़िल्म मेंइंदिरा गाँधी के जीवन की एक झलक है जहाँ नायिका परिवार के बजाय राजनैतिक करियर को अधिक महत्त्व देती है। मासूम में कैमरा स्त्री-पुरुष संबंधो को गुलज़ार के अंदाज़ में देखता है। परिचय से रुलाने वाले गुलज़ार ने अंगूर से हँसाया है तो अचानक से चौंकाया भी है। कभी ठेठ गुलज़ारवी अंदाज में माचिस से आतंकवाद पर नज़र दौड़ाते गुलज़ार दिखते हैं तो कभी हु तू तू से राजनीति पर तब्सिरा करते गुलज़ार ध्यान खींच लेते हैं। गुलज़ार की फ़िल्में हर पीढ़ी को गुदगुदाती, हँसाती, रुलाती, सिखाती, पढ़ाती रही हैं। फ़िल्म निर्देशक के तौर पर उनका सफ़र 1999 में थम गया मगर 1956 में पहली बार गीतकार के तौर पर क़लम थामने वाले गुलज़ार आज भी एक ओर “कजरारे कजरारे” पर जवान पीढ़ी को नचाते हैं तो दूसरी ओर “जय हो” पर कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार ले जाते हैं।

गुलज़ार की फ़िल्में हों या गीत, फूहड़ता से वे हमेशा दूर रहे और बाज़ार में मौजूद रहकर भी अपने न बिकने की ताक़त का एहसास वे हमेशा करवाते रहे। गुलज़ारजब लिखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने प्रकृति से शब्दों के फूल उठाकर काग़ज़ परआहिस्ता से रख दिए हों। चूँकि वह फूलगुलज़ार रखते हैं इसलिए उनमेंख़ुशबू ख़ुद चलकर आती है। जैसे मोटर-गाड़ी सेदौड़ती सड़कों पर अचानक कोई हरा-भरा मोर दिख जाए। जैसे सुलगते हुए दिल पर रूई का गुलाबजल में भीगा। जैसे ख़ुरदरे, कर्कश शोर मचातेसंगीत के बीच अचानक सबकुछ थम जाए और दूर कहीं से सुरीली बाँसुरी बज उठे। शायरीऔर क़िस्सागोई से लेकर फ़िल्म निर्माण, पटकथा-संवाद लेखन व निर्देशन तकगुलज़ार का एक बड़ा कारोबार फैला है लेकिन यह कारोबार क़भी फ़िल्मी दुनिया कीबाज़ारवादी मांग और आपूर्ति का संसाधन नहीं बना है। वह पूरे तौर पर अदबी औररचनात्मक है। गुलज़ार का होना यह बताता है कि शायरी की शुचिता फ़िल्मी दुनियाकी कारोबारी समझ के बावजूद क़ायम है।

raat pashmeene ki
रात पश्मीने की

गुलज़ार के काम को एक लेख में बता पाना न तो मुमकिन है, न ही उचित। गुलज़ार को समझना, जानना, सुनना, देखना तो जैसे रोज़ होने वाला काम है। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल से लिखते गुलज़ार आज भी रोज़ कुछ नया रचते हैं, अपने पुराने अंदाज़ में। उन्हीं के शब्दों में “रोज़ रात छत पर तारे आते हैं और आँखें झपकाकर कहते हैं कि कह दे। रोज़ रातचंद्रमा सिर पर आकर खड़ा हो जाता है और मुँह बनाकर कहता है — कह दे। पतानहीं, ये हवाएँ कहाँ से चली आती हैं और हलचल मचाती हुई कह जाती हैं कि कहदे। और तो और, अधखुली खिड़की में वह पीला फूल बार-बार झाँककर कहता है कि कहदे।”

आज गुलज़ार का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की ढेरों मुबारकबाद और मुबारकबाद से भी ज़्यादा अदब की दुनिया की ओर से उन्हें धन्यवाद, क्योंकि अदब की यह दुनिया गुलज़ार से गुलज़ार है। जैसा कि एक पाकिस्तानी शायर ने उनके बारे में दिल्ली के एक जलसे में कहा था —

“देखकर उनके रुख़सार-ओ-लब यक़ीं आया

कि फूलखिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी”


गुलज़ार फ़िल्मोग्राफ़ी (बतौर निर्देशक)

* मेरे अपने (1971) * परिचय (1972) * कोशिश (1972) * अचानक (1973) * ख़ुशबू(1974) * आंधी (1975) * मौसम (1976) * किनारा (1977) * किताब (1978) * अंगूर (1980) * नमकीन (1981) * मीरा (1981) * इजाज़त (1986) * लेकिन (1990) * लिबास (1993) * माचिस (1996) * हु तू तू (1999)

टीवी सीरियल

* मिर्ज़ा ग़ालिब (1988) * किरदार (1993)

प्रमुख किताबें

* चौरस रात (लघु कथाएँ, 1962) * जानम (कविता संग्रह, 1963) * एक बूंद चाँद (कविताएँ, 1972) * चाँद पुखराज का (1992) * रावी पार (कथा संग्रह, 1997) * रात, चाँद और मैं (2002) * रात पश्मीने की * खराशें (2003)

प्रमुख एलबम

* दिल पड़ोसी है (आरडी बर्मन, आशा/ 1987) * मरासिम (जगजीतसिंह/ 1999) * विसाल (ग़ुलाम अली/ 2001) * आबिदा सिंग्स कबीर (2003)

Satish Sharma

By Satish Sharma

Chartered accountant, independent columnist in newspapers, former editor of Awaz Aapki, activist in Anna Andolan, based in Roorkee

Leave a Reply